Saturday, 18 May 2013

ज़मीन, ज़ुबान, तमीज़ व तहज़ीब ............



ज़मीन, ज़ुबान, तमीज़ व तहज़ीब ............


'ज़मीन, ज़ुबान, तमीज़ व तहज़ीब' - कहने को ये मात्र चार शब्द हैं पर इनका अर्थ अत्यंत गहरा व गंभीर है. ज़मीन अर्थात धरती , जिस पर हम जन्म लेते हैं , चलते हैं, किसी भी वस्तु का आधार ही ज़मीन है. ज़ुबान अर्थात हमारी बोली ...हम जो सोचते हैं ...जो दिल व दिमाग में विचार होते हैं...उन्हें अपनी बोली भाषा , ज़ुबान द्वारा प्रकट करते हैं . तमीज़ व तहज़ीब का दायरा हमारे संस्कार , शिष्टाचार , शिक्षा आदि के इर्द- गिर्द होता है.
यदि इन चार शब्दों की और विवेचना की जाए तो ये चार शब्द ( ज़मीन, ज़ुबान, तमीज़ व तहज़ीब ) हर किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की बुनियाद होते हैं... पहचान होते हैं. ये चार शब्द हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं. हम क्या हैं, कौन हैं, क्यों हैं आदि प्रश्न खुद को ज़मीन से जोड़े रखने के लिये निहायत जरुरी है....हमारे इतिहास को दर्शाते हैं.... हमारे संस्कृ्ति व संस्कारों को दर्शाते हैं.


आज के परिवेश में हर कोई खुद को ज़मीन से जुड़ा हुआ कहना पसंद करता है. कोई भी यह नहीं चाहता कि कोई उसे ' बदतमीज' शब्द से नवाज़े . हर कोई खुद को तहज़ीब पसंद लोगों के इर्द-गिर्द ही देखना व उनके साथ रहना पसंद करता है. परंतु वास्तविकता में एक व्यक्ति के भीतर इन चार शब्दों का कितना समावेश है या बिल्कुल नहीं, यह कोई अपने लिये समझना नहीं चाहता पर दूसरों को तमीज़ व तहज़ीब व उसकी ज़ुबान के बारे में भाषण देने में तनिक भी गुरेज़ नहीं करता .
पारिवारिक संस्कारों , हमारी परवरिश के अलावा कक्षा प्रथम से ही हम सभी को शिष्टाचार ( तमीज़ व तहज़ीब ) की बातें सिखायी जाती हैं ...इसके बावजूद व्यक्ति की उम्र के साथ उसके दिमाग से इन चार शब्दों का वजूद नष्ट होने लगता है. हमारे आधुनिक समाज का कटु सत्य है कि आज इन चार शब्दों को तवज्जो देने वालों की संख्या बेहद अल्प है. मैं यदि अपने निजि अनुभवों की ही बात करुँ तो अपनी ज़िंदगी के 22 वर्षों में मेरा सामना अधिकतर उन लोगों से हुआ है जो हर वक़्त अपने चेहरे पर मुखौटा पहने रहते हैं.... ' मुखौटा ' - जो उनके भयानक चेहरे व शख्सियत को छुपाने की की क्षमता तो नही रखता किंतु कुछ देर के लिये ही सही उनकी असलियत पर आवरण जरुर डाल देता है. ...... ऐसे लोग खुद को समाज के ठेकेदार मानते हैं ..बात - बात में उनके मुख से यही शब्द निकलते हैं कि समाजिकता का ख्याल रखें ....समाज...समाज...समाज......बस समाज.......और खुद समाज नामक शब्द का मंत्रोच्चारण करते-करते कितने गैर -समाजिक कृ्त्यों को अंजाम देते रहते हैं..... जिसके लिये उन्हें खुद से घृ्णा भी नहीं होती. ...बल्कि अपनी घृ्णित हरकतों को छिपाना ......खुद को भला मनुष्य बता कर व दूसरों को मूर्ख बना कर खुद की "Over Smartness" पर इतराते हैं...भले ही सामने वाला व्यक्ति उनके काले - कारनामों से भली- भाँति परिचित ही क्यों न हो.
पर यह भी हमारे आधुनिक समाज का काला सच ही तो है कि ऐसे दूषित विचारों वाले व्यक्ति , तमीज़ व तहज़ीब से कोसो दूर, शिक्षित होने के बावजूद शिक्षा की धज्जियाँ उड़ाने वाले लोगों को हमारा समाज, सिर्फ अपनाता ही नहीं अपितु फूलने-फलने के अवसर भी प्रदान करता है.
यदि सूक्ष्म स्तर की बात करें तो किसी के लिये अपशब्दों का प्रयोग, ईर्ष्या के कारण किसी की बदनामी कराना, द्वेष के कारण शिष्टाचार के सभी दायरों को तोड़ बदमिजाज़ी की सारी हदें पार कर सामने वाले को मजबूर करना कि वो अपने मार्ग से विचलित हो जाए ..... ये सब हमारे समाज के युवाओं के 'Cool Tactics  ' कहे जाते हैं.... और मेरे अनुसार अपने नकारेपन, बददिमागी , लूसरपने , झूठी व सस्ती ईगो की असलियत को सबसे छिपाने के लिये अपनी नपुंसकता का परिचय देने वाली हरकतें....
यह मुद्दा काफी लंबा है तो शायद इसकी कई श्रृंखलाओं से भी आप सभी पाठकों का साक्षात्कार हो .... इससे पहले कि मैं और उदाहरणों को गहराई से प्रस्तुत करुँ, सर्वप्रथम इस लेख को लिखने के पीछे मुख्य कारण क्या है, इस पर प्रकाश डालना चाहूँगा.

' ज़मीन, ज़ुबान, तमीज़ व तहज़ीब ' एक प्रयास है हमारे आधुनिक समाज के उस घिनौने चेहरे से आप सभी को अवगत कराने का जो हमारे समाज को दिनों-दिन खोखला कर रहे हैं... मैं , कोई महान आत्मा नहीं.... महानता नहीं कर रहा है...... पर इतना जरुर कर रहा हूँ कि हमारे समाज में जो भी अच्छाई बची है , जो अच्छे लोग हैं, यदि उनका ऐसे घटिया किस्म के लोगों से सामना हो तो उस पल उन्हें अपनी अच्छाई पर गर्व हो न कि बुरे लोगों की बुराई देख दुख.... बल्कि समाज में विद्यमान ऐसे गंद लोगों की गंदगी द्वारा विचलित होने की जगह अच्छे , भोले, मासूम लोगों को उन पर हँसना चाहिये क्योंकि दूषित विचारों के लोग सिर्फ और सिर्फ मज़ाक व हँसी के ही पात्र हैं और कुछ भी नहीं.

चलिये लेख की गति को बढ़ाते हैं....... अपने निजि अनुभवों की कुछ यादों को उदाहरण स्वरुप प्रस्तुत कर रहा हूँ.....  हम सभी इस बात से भली-भाँति अवगत हैं कि किसी से उसकी उम्र , शिक्षा,सैलरी { तनख्वाह } व पद नहीं पूछना चाहिये...... और किसी छोटे को तो अपने से बड़ों से इस तरह के प्रश्नों  की झड़ी लगाने से पहले अपने संस्कारों को पुन: दोहराना चाहिये. परंतु आज के परिवेश में युवा बहुत कूल हैं.......... इतने कूल कि उन्हें अपने से बड़ों का कोई लिहाज नहीं { बड़ें  ज्यादा खुश न हों , अभी उनकी बेहूदगियों की लिस्ट भी मेरे पास है }.





' ................' - यह एक नाम है जिसको प्रकाशित नहीं करुँगा . यह मुझसे उम्र में 4 वर्ष छोटा है. खुद को बहुत मेहनती, सहनशील मानता है. और दुनिया भर का बोझ .....ध्यान दीजियेगा सिर्फ पारिवारिक नहीं अपितु दुनिया भर का बोझ उस मासूम के छोटे- छोटे कंधों पर है......ऐसा उसका मानना व कहना है . मैं उसके परिवार को काफी समय से जानता हूँ ..... सीधे लोग हैं और थोड़ा संघर्ष भरा जीवन भी है. अत: एक बार उसके पिताजी ने मुझसे कहा कि बेटा ! ऋषभ !! मेरा पुत्र काफी परेशान रहता है ...... तुम उससे बात करो. पता नहीं क्या चीज़ उसको काटे जा रही है . दिनों - दिन उसका आत्मविश्वास टूटता जा रहा है . बेटा ! तुमसे मैं उम्मीद कर सकता हूँ ...तुम कृ्पा कर उससे बात करना , अंकल की बात का मान रखते हुए मैंने अपने busy schedule से थोड़ा समय मिकाल कर उस गधे से बात की और उसकी ढेंचू - ढेंचू सुन मेरे कान पक गए.

" भइया ! मुझसे कोई बात नहीं करता  . सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं. मुझमें Leadership Quality नहीं है ... मैं ठीक से बोल नहीं पाता ...कोई मुझे पसंद नहीं करता ...मेरी गर्ल फ्रेंड नहीं है आदि आदि  "

मैंने उसे सांत्वना दी कि अभी तुम पढ़ाई पर दिमाग लगाओ.... थोड़ा Meditation, yoga किया करो या gym join कर लो ...खाली समय में soft music सुना करो . कोई Instrument या dance classes join कर लो , कॉलेज की हर co-curricular activities में भाग लो . धीरे- धीरे तुम्हें अपने में आत्मविश्वास की अनूभूति होगी और लोग भी तुम्हें पसंद करेंगे.

इसके एक हफ्ते बाद उन महाशय की काया बदल गई...... मैं खुश था कि चलो भगवान चित्रगुप्त ने मेरे जीवन के बही - खाते में एक अच्छा कार्य दर्ज कर लिया होगा और मेरे लिए मृ्त्युपरांत स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त हो रहा है. पर ये क्या एक दिन वही गधा '...............' मेरे पास आया.
मैं उस वक़्त एक सिर दर्द Project  पर काम कर रहा था. वह मेरे कमरे में आया और थोड़ी देर हाल- चाल पूछने के बाद कहता है ....  भइया ! क्या मैं आप के लैपटॉप में एक ' सी ' ग्रेड मूवी देख लूँ? मैं कुछ काम कर रहा था  ...मैंने उससे पूछा क्या सी ग्रेड ? ...जनाब कहते हैं अरे ! अब ऐसा तो होगा नहीं कि आपको सी ग्रेड मूवी का मतलब नहीं पता ...... सी ग्रेड मूवी मतलब 'ब्लू फिल्म' ....... मैं स्तब्ध रह गया ...मैंने उससे कहा कि शायद तुम भूल रहे हो कि मैं उम्र में तुमसे कितना बड़ा हूँ ... अपनी हद में रहो...मेरे सख़्त रवैये को देख् वो थोड़ा हड़बड़ा गया और सॉरी भइया कह कर चला गया...

करीब एक महीने के बाद उस गधे के तो रंग ही बदल गए...एक दिन बातों- बातों में मुझसे पूछने लगा कि आप इंटीरियर डिज़ाइनर हैं ? क्या आपको पता है कि इंटीरियर डिज़ाइनिंग का इतिहास क्या है ...इसकी शुरुआत कब से हुई ...सबसे पहला इंटीरियर डिज़ाइनर कौन था ........आप कितने बड़े इंटीरियर डिज़ाइनर हैं ..क्या आपको देख कर कोई हाथ जोड़ता है.... आपको देख कोई नमस्कार करता है ...आप कितना कमा लेते हैं ..क्या गारंटी है कि आप प्रोजेक्ट्स हैंडल करते भी हैं कि क्या पता आप के पास पैसा कहाँ से आता है?????
उसकी ये बकवास सुन सीधे मन किया कि एक तमाचा घसीट कर उसके मुँह पर  मारुँ पर उसके माँ- बाप के सम्मान के कारण मैंने ऐसा किया नहीं ..... अपने क्रोध पर नियंत्रण रखते हुए उस गधे से मैंने बस इतना ही कहा कि अभी तुम मेडिकल की तैयारी कर रहे हो ....डॉक्टर बन नहीं गए ... तो जरा अपने को और अपने प्रश्नों व जिज्ञासाओं को अपने भविष्य के लिए व खुद के आंकलन के लिए बचा कर रखो...वरना सब्जी का ठेला लगाने के लायक भी नहीं रहोगे.
रही बात मेरी मैं तुम्हारे हर प्रश्न का जवाब देता हूँ इसलिए नहीं कि तुम्हारी इतनी हैसियत है कि मैं तुम्हारे प्रश्नों का जवाब दूँ अपितु इसलिए ताकि तुम्हें समझ में आए कि मैं आज कहाँ स्टैंड कर रहा हूँ ...
उसके बाद मैंने उस गधे को इंटीरियर डिज़ाइनिंग की History ,Civics, Geography, Chemistry , physics , biology etc.   सब बता डाली ...यह सब सुनने के बाद वो गधे महाशय कहते हैं कि बाप रे भइया ! एक बात तो तय है कि आपको Knowledge  बहुत है....... मैंने गधे महाशय से कहा कि अब तुम भी कोशिश करना कि तुम्हें भी तुम्हारे कार्य क्षेत्र के बारे में इतनी ही Knowledge हो .....क्योंकि 4- 5 वर्षों के बाद यदि मिले तो तुमसे जरुर पूछूँगा कि कितने बड़े डॉक्टर बन गए हो तुम.

आज 5 वर्षों से अधिक समय हो गया है उस गधे ने मेडिकल की तैयारी करते - करते अपने माँ- बाप का रुपया पैसा जमा पूँजी सब व्यर्थ कर दी और अंतत: आज परचून की दुकान में अपनी सक्रिय भागीदारी दे रहा है और अपने नकारेपन व लूसरपने को मानने के बजाए  अपने की पारिवारिक सद्स्यों को व अपनी आर्थिक स्थिति को अपनी दुर्दशा का ज़िम्मेदार बताता फिरता है ...... बेशर्मों की तरह .
ऐसे बेशर्मों की बेशर्मी वाकई काबिले- तारीफ है.................
एक अन्य वाक्या बताता हूँ................ काफी समय पूर्व जब मैंने डिज़ाइन कॉलेज में दाखिला लिया तो पता नहीं कहाँ से इस बारे में मेरे कुछ रिश्तेदारों को भनक लग गई ... अब रिश्तेदार तो रिश्तेदार होते हैं तो रिश्तेदारी के नाम पर उन्हें लाइसेंस प्राप्त होता है बक ‍$#@! करने का ......
तो बस आए एक जनाब एक दिन मेरा इंटरव्यू लेने .....जैसे ही मैंने उनसे नमस्ते किया , वैसे ही उन्होंने ने मेरे नमस्ते का जवाब न देते हुए मुझसे कहा ..सुना है तुम दिल्ली जा रहे हो ? क्यों जा रहे हो ? तुम्हें तो अभी से देख कर लग रहा है कि तुम बाहर जाकर अपनी तमीज भूल जाओगे.......

मैंने पूछा क्यों जी ! आपको अभी से ऐसी भविष्यवाणी कैसे हुई ....वे बोले तुमने मेरे पैर नहीं छुए इसलिए .... मैंने उनसे कहा .. देखिये आज मेरे दिल्ली जाने की खुशखबरी में आप इतना खुश हो गए कि शायद आप मेरा और आपका रिश्ता भी भूल गए हैं ,,,,पिछले 17 वर्षों से में आपसे नमस्ते ही करता था तब आपको कोई परहेज नहीं था लेकिन ये दिल्ली जब से बीच में आई ....जिसके कारण मैं तो नहीं.... पर आप ये भी भूल गए कि आप रिश्ते में हमारे 'मामा जी' हैं और हमारे ब्राह्मण समाज में मामा के पैर नहीं छुए जाते हैं वरना उन्हें नर्क की प्राप्ति होती है - ऐसा कभी आपने ही कहा था .....पर नहीं ..... अब आपको पैर ही छुआने हैं क्योंकि दिल्ली जाकर मैं अपनी तमीज़ भूल गया हूँ.... लेकिन आपकी इस तरीफे काबिल बातचीत ने साफ कर दिया कि अब से मुझे आपसे नमस्ते भी नहीं करना चाहिये क्योंकि जिस अंदाज़ में आपने मुझसे बात की है वो किसी बालक की अबोध मानसिकता को हिला देने में और उसको उसके मार्ग से विचलित कर देने के लिए पर्याप्त है.

फिर सुनिये क्या बोले मेर so- called मामा जी ......  तो क्या तुम रितु बेरी, रोहित बल , मनीष मलहोत्रा बन जाओगे डिज़ाइनिंग की पढ़ाई करने के बाद .... डिज़ाइनिंग इतना जटिल विषय है और फिर कितनी प्रतिस्पर्धा है पता नहीं है तुम्हें ..... वगैरह वगैरह ..उन्होंने उनके खुद के बच्चों को भी शायद इतनी   Career Counselling नहीं दी होगी ..
मैंने हँसते हुए कह दिया कि अरे ! मेरे इतने ऊँचे ख्वाब नहीं .....बस अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँ ......बस इतनी ही तमन्ना है बाकी अब आप इतना कह रहे हैं तो मैं भी बता दूँ कि ईश्वर की कृ्पा हुई तो सीधे Donatella Versace  और  Coco  Chanel के ही Male Version बन जाएंगे .......

फिर सुनिये उनकी बकवास  ...... मेरे पिताजी की तरफ देखते हुए कहते हैं कि देख रहे हैं आप ! इन महाशय के अमरीका जाने के ख्वाब हैं ....
इससे पहले कि वो और कुछ बोलते { भौंकते } , मैंने कहा....... अरे नही ! अमरीका तो आप अपने बच्चों को भेजियेगा ...हमें तो भारत से ही प्रेम है और डिज़ाइनिंग की पढ़ाई करके वापस उत्तर प्रदेश में ही उद्योग स्थापित करने का जिगरा और हौसला है .
मेरी इस बात पे उनका Frustration बढ़ गया और कहते हैं अरे! तुम तो ऐसे बात कर रहे हो जैसे जाने कौन से किले गाढ़ { किले बनवाना } दोगे..............
मैंने उनसे कहा कि ऐसा है कि मैं तो कुछ बात कर नहीं रहा हूँ ...बात तो उतनी देर से आप ही कर रहे हैं ...मैं चाहे जितनी भी कोशिश करुँ कि आपकी बातों को Positively  लूँ पर आप मुझे मजबूर कर रहे हैं ये कहने के लिए कि अब मैं कौन से किले गाढ़ता { किले बनवाता } हूँ ...ये तो वक़्त ही बताएगा ..फिलहाल आगे से आप मम्मी - पापा के Reference से आइए , आपका स्वागत है ...मेरा आपसे कुछ लेना देना नहीं और अब से मुझसे किसी भी प्रकार की उम्मीद मत रखियेगा ...... नमस्ते तक की उम्मीद न रखें , वही बेहतर है हम दोनों के लिए . इतना कह कर मैं हट गया वो बराबर बकर - बकर करता रहा और जैसी कि मुझे उम्मीद थी कि मम्मी- पापा मुझे डाँटने लगे .... मैंने भी कह दिया कि वो इतनी बकवास कर रहे हैं आप उन्हें चुप नहीं करा रहे हैं और मुझे चुप कर रहे हैं ...उनकी जलन की दुर्गंध मुझसे सहन नहीं हुई और हर एक चीज़ की एक सीमा होती है ... ऐसे रिश्तेदारों से तो अकेला रहना ही भला ... आप लोग रिश्तेदारी निभाओ पर मुझसे अपेक्षा न रखो .......


एक मेरे करीबी ने एक दिन मुझसे कहा था कि यही समाजिकता है .... सबसे अगर तुम ऐसे ही नाराज़ हो जाओगे तो कैसे काम चलेगा ....थोड़ा Compromise   व लचीला रवैया तो अपनाना ही पड़ता है ...सुख - दुख में यही लोग काम आते हैं...... उनकी इस बात पर मेरा तर्क था कि सुख के दिनों में तो इस तरह का नकारात्मक रवैया सामने आया है...... जो सुख के क्षणों को दुख में बदल दे तो दुख के समय में क्या होगा ?????
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मैंने यह भी कहा कि  मैं अपनी बात कर रहा हूँ ...ये मेरे उसूल हैं ... अगर इसी रवैये के साथ मैं सदैव अकेला भी रहा तो मुझे गर्व होगा पर सब कुछ समझते हुए भी दूसरों की बकवास या जलन के कारण खुद को क्षति पहुँचाना - कहाँ की समझदारी और तब जब आप कोई गलत काम न कर रहे हों. ज्यादा से ज्यादा लोग यही कहेंगे कि जब मैं मरुँगा तो कोई कंधा देने नहीं आएगा तो उसका भी मैंने इंतेज़ाम सोच लिया है कि मैं मरने से पहले अपने शरीर का दान { देह - दान } कर दूँगा ..... और बोलो ..... अब क्या कहेंगे आप ............... ऐसा करने से मरोणोपरांत जो पूजा और हवन में खर्च आता है उसका भी कष्ट किसी को नहीं होगा और अर्थी को कंधा देने के लिए भी चार लोगों की भी जरुरत नहीं पड़ेगी .
मेरे इस कथन को सुन वो व्यक्ति स्तब्ध रह गया और नि: शब्द रह गया ........ पर मैं क्या करुँ मैं ऐसा ही हूँ......... और अपनी इन्हीं खूबियों के कारण मैं खुद पे मरता हूँ .......   वो कहते हैं ना कि मैं अपना Favourite हूँ  {  JAB WE MET  में करीना कपूर का Dialogue था और अच्छे Dialogues की cheating करने में किसी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिये ......  हा हा हा हा........... }


खैर , ईश्वर की कृ्पा से बड़ी ही कम उम्र में मुझे इंटीरियर डिज़ाइन कॉलमिस्ट के तौर पर काम करने का मौका मिला .......लोगों ने हौसला बढ़ाया तो मेरी खुद की बुक 'एक आशियाने की ओर' प्रकाशित हुई जिसका बहुत अच्छा Response   मिला ......  और जैसी की मुझे उम्मीद थी कि मेरे मामा जी को भी इसकी भनक लग गई . एक दिन आए घर पर और पूछने लगे रवि बेटा कहाँ है ! रवि बेटे से मिलना है ! { रवि मुझे घर पर लोग प्यार से बुलाते हैं } ......मेरा मन तो नहीं था उनका मुँह देखने का फिर वर्षों पहले की बात याद आ गई जब उन्होंने मुझसे कहा था कि देखते हैं कौन से किले गाढ़ { किले बनवा } लेते हो ..... और बस मेरे मन मस्तिष्क में खुराफात जाग उठी ...... और मैंने सोचा कि चलो मामा जी से मिल ही लेते हैं..... 




 मामा जी की तरफ मैंने देखा पर नमस्ते नहीं किया ..सीधे उनके बेटे से हाल चाल पूछे...... उनके बेटे मुझसे उम्र में बहुत बड़े हैं. मैंने उन्हें बताया कि भइया आप को पता है कि मेरी खुद की बुक प्रकाशित हुई है ..... बहुत बढ़िया Response भी मिला है ...अपने देखी ??

उन्होंने कहा कि सुना तो था पर देखी नहीं .... मैंने उनसे कहा कि रुकिए अभी मैं आपको अपनी बुक दिखाता हूँ ... बुक को देखते ही भइया काफी तारीफें करने लगे ....बीच - बीच में मैं मामा जी के चेहरे के भावों को Judge कर रहा था फिर मैंने भइया से पूछा कि तो भइया...... अब आप बताइये कि कैसे किले गाढ़े { किले बनवायें } है आपके छोटे भाई ने ????

भइया और मामा जी मुझे देख कर रहे गए .....चूंकि मामा जी ने कुछ समय पूर्व जो मुझसे बकवास की थी उसके साक्षी भइया भी थे .....तो उन्हें भी वो वाक्या बखूबी याद था.

यह कहने के बाद मैंने मुस्कुराते हुए मामा जी की ओर देखा और भइया से पुन:  पूछा , " हाँ भइया तो बताइये कि कैसे किले गाढ़े { किले बनवायें } है आपके छोटे भाई ने ????

अब भइया ने फीकी सी हँसी के साथ अपने पापा { मेरे पूज्यनीय मामा जी } की ओर देखते हुए कहा बहुत मजबूत किले गाढ़े { किले बनवाए } हैं .... अपने बेटे की ये बात सुन मामा जी की निगाहें झुक गईँ... और मैं बदतमीज़ों की तरह अट्ठास करने लगा ..... वैसे मुझे ऐसा नहीं करना चाहिये था पर मेरा आक्रोश ज्वालामुखी के लावे की तरह फूट पड़ा जिस पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं था .
फिर मैंने कहा कि भइया आप तो बचपन से मुझे देख रहे हैं क्या करुँ अब देखिये कुछ लोग मेरे ही घर आएंगे ..... चाय नाश्ता खाएंगे और मुझसे ही बकवास करने लग जाएंगे कि कौन से किले गाढ़ दिए तुमने रवि !!!!!!! आप बताइये ऐसे लोगों को आप क्या कहेंगे और ऐसे लोगों के साथ आपको क्या करना चाहिये ...

भइया ने अपने पिताजी { मेरे पूज्यनीय मामा जी } की तरफ थोड़ी नफरत से देखा और कहा कि अरे बेटा ! लोगों की जलन और ईर्ष्या की कोई सीमा नहीं होती ...तुमने ये बुक मुझे दिखायी क्योंकि तुम मेरा सम्मान करते हो ....तुम्हें तहज़ीब है और मैं भी अपने छोटे भाई की सफलता से खुश हूँ लेकिन हर किसी को तमीज़ नहीं होती ... दूसरों की सफलता देखकर लोग अमूमन जल उठते हैं...लेकिन जिसकी ख्याति फैलनी होती वो फैल ही जाती है जैसे कि तुम ....... 


मैंने भइया से कहा कि बस आपकी यही बात तो मुझे अच्छी लगती है कि आप निष्कपट स्वभाव के हैं.... तभी मैं आपकी इज्जत करता हूँ ..बाकी जिनको ज्यादा गर्मी सवार है या जो ज्यादा ईर्ष्यालु या कुंठित हो रहे हैं और मुझे छोटा समझ के अपना Frustration मुझ पर निकाल रहे हैं तो ऐसे लोगों को मैं जूते मारकर ही भगाता हूँ ... कुछ गलत तो नहीं करता ...क्यों भइया ?????

मजबूरी में ही सही पर भइया ने कहा , " सही बात है रवि बेटा ! और किया भी क्या जा सकता है ... बड़ो को भी सोच - समझ के बात करनी चाहिये ..."

मैंने कहा , " बिल्कुल ठीक !"






मामा जी की निगाहें बराबर झुकी रहीं .. और उनकी झुकी निगाहों को देख मुझे थोड़ा बुरा लगा पर जिस चीज़ की शुरुआत उन्होंने की थी, मैंने सिर्फ उसका अंत किया था .......क्योंकि शायद मेरी जगह कोई और होता तो उस वाक्ये के बाद वो अपना आत्मविश्वास खो बैठता ...पर भइया की बात ने मुझे अहसास दिला दिया कि दुनिया सच में गोल ही है .............
कुछ समय पूर्व जब मैं मामा जी से तमीज़ से पेश आ रहा था तो मुझे बदतमीज़ कहा गया पर आज जब मैंने सच में बदतमीज़ी करी तो मुझे कहा गया कि तुम सम्मान करना जानते हो ......... तुम्हें तहज़ीब है............

शायद यही है जमीन, जुबान , तमीज़ व तहज़ीब का खेल ......लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि हम दूसरों को सम्मान न दें .... अपनी ओर से पहला कदम अच्छा ही बढ़ाइये ....दूसरों से तमीज़ व तहज़ीब से पेश आइये  पर अगर सामने वाले को आपके द्वारा दी गई इज्जत हज़म न हो तो उसे अच्छे से  ' हाजमोला ' अवश्य खिलाइये......... समझदारों को इशारा ही काफी है .


आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका प्यारा और थोड़ा " बदतमीज़ ":

                                                      - ऋषभ शुक्ल



 
 

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13 comments:

  1. गौतम करन वर्मा .18 May 2013 at 05:43

    तीखे कलम के तीखे वार .... 'जमीन, जुबान, तमीज व तेह्जीब 'के लेखों का इंतजार खत्म हुआ और इस बार भी आप अपने पाठकों की उम्मीदों पर खरे उतरे .बहुत बढ़िया लेख .. बधाई

    गौतम करन वर्मा .

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  2. डॉ अर्चना18 May 2013 at 05:49

    आपका यह लेख हमारे समाज के संकीर्ण मानसिकता के लोगों के मुँह पर करारा तमाचा है .. बहुत क्रोध आ रहा है आपके मामा के घटिया बातों को पढ़ कर .आप नि: संदेह आज के युवाओं के लिए उदाहरण हैं ...............बहुत अच्छा किया जो आपने ज़िंदगी के हर संघर्ष का डट कर सामना किया .
    आपकी लेखनी में अगर मासूमियत है , भोलापन है ( आपकी तरह )तो साहस, पौरुष भी है ...अपका हर लेख प्रेरणादायी है व समाज में फैले गंदे लोगों के लिए एक सबक भी है .

    - डॉ अर्चना

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  3. प्रीत गुप्ता18 May 2013 at 05:51

    एक तमाचा मार प्रस्तुति . बहुत खूब
    - प्रीत गुप्ता

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  4. नितीश दुबे18 May 2013 at 05:55

    एक दम सही लिखा है भाई आपने . कमाल हो आप . जिस गधे के बारे में आपने लिखा है ऐसे लोग से मेरा रोज सामना होता है . मार्केटिंग प्रोफेशनल हूँ ..हर रोज हर तरीके के लोगों से डील करूँ ... और सबकी बकवास का कितना जवाब दूँ ... हर एक को कंटाप भी तो नहीं मार सकते आखिर सभ्य समाज का हिस्सा हैं हम पर लगता है कि सारे समाज का ठेका हमने ही ले रख हो ... ऐसे फालतु के लोगों को कैसे डील करना चाहिये ये सोच सोच कर दिमाग खराब हो जाता है ... जैसा कि आपने लिखा कि समाजिकता का पाठ पढ़ाने वालों की कमी नहीं.... और ऐसे लोगों को झेलना ही इतना मुश्किल लगता है .........

    पर आप का यह ब्लॉग पढ़ कर वाकई मज़ा आ गया . क्या धज्जियाँ उड़ाईं हैं आपने . वाह ! आपके व्यक्तित्व व ब्लाग्स को यदि एक शब्द में बयाँ करुँ तो वो है , " तूफान ".

    - नितीश दुबे

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  5. VERY SARCASTIC................BUT ITS REALITY AND I AM COMPLETELY AGREED WITH YOUR APPROACH OF DEALING WITH SUCH PEOPLE.THUMBS UP FOR THIS XTRA BOLD AND SATIRICAL ARTICLE.LOVE YOUR HONESTY.
    HATS OFF TO YOU ....KEEP GOING MAN

    -Varun Mittal

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  6. अशोक कुमार19 May 2013 at 04:50

    प्रेरणादायी लेख
    -अशोक कुमार

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  7. पुलकित भावे19 May 2013 at 04:56

    "ज्यादा से ज्यादा लोग यही कहेंगे कि जब मैं मरुँगा तो कोई कंधा देने नहीं आएगा तो उसका भी मैंने इंतेज़ाम सोच लिया है कि मैं मरने से पहले अपने शरीर का दान { देह - दान } कर दूँगा ..... और बोलो ..... अब क्या कहेंगे आप ............... ऐसा करने से मरोणोपरांत जो पूजा और हवन में खर्च आता है उसका भी कष्ट किसी को नहीं होगा और अर्थी को कंधा देने के लिए भी चार लोगों की भी जरुरत नहीं पड़ेगी ."
    इन चंद पंक्तियों के द्वारा कितनी बड़ी बात कर दी ऋषभ जी . सचमुच इतनी गहरी सोच .... इतने क्रांतिकारी विचार ..विचारों में इतनी मौलिकता और ज़िंदगी की कटु सच्चाई . अगर आपकी तरह सबकी सोच हो जाए तो शायद किसी को किसी बात का दुख ही न हो .आप्के इस चिट्ठे ने मुझे उम्र के 50वें वर्ष में ज़िंदगी को पुन: समझने को मजबूर कर दिया है . बहुत - बहुत आशीष व आभार !

    - पुलकित भावे

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  8. लता सिंह, कोटा19 May 2013 at 04:58

    पथ प्रदर्शक प्रस्तुति . सटीक शब्दों का प्रयोग . आपको शब्दों का राजकुमार कहूँ तो शायद गलत न होगा .
    बधाई !

    लता सिंह, कोटा

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  9. मिताली त्रिवेदी19 May 2013 at 05:10

    ऐसी परेशानियों का कारण रिश्तेदार ही होते हैं .सही कहा आपने रिश्तेदारी के नाम पर उन्हें मानो लाइसेंस प्राप्त हो जाता है बदतमीजी का . लोग कहते है कि ऐसी बातों पर ध्यान न दो पर कैसे ध्यान न दे ...दूसरों की जुबान पे तो जैसे लगाम ही नहीं रह जाती है . मेरे पास भी ऐसे अनेको उदाहरण हैं पर मुझे लगता था कि कुछ नहीं कर सकती मैं ....... पर आपके अनुभव पढ कर ऊर्जा आ गई .... बहुत अच्छे से सीधा किया आपने सबको तभी ईश्वर ने आपको इतनी तरक्की प्रदान की . बहुत बढिया . बधाई और शुभकामनायें

    - मिताली त्रिवेदी

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  10. आदित्य अवस्थी19 May 2013 at 05:19

    "अपनी ओर से पहला कदम अच्छा ही बढ़ाइये ....दूसरों से तमीज़ व तहज़ीब से पेश आइये पर अगर सामने वाले को आपके द्वारा दी गई इज्जत हज़म न हो तो उसे अच्छे से ' हाजमोला ' अवश्य खिलाइये......... समझदारों को इशारा ही काफी है ."

    बस आपकी यही सीख ज़िंदगी जीने के लिए काफी है और ऐसे विकृ्त मानसिकता के लोगों का मुँह तोड़ जवाब देने के लिए एक मात्र कुँजी भी.इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी - बड़ी बातें ..... आश्चर्य होता है ..नि: संदेह आपकी लेखनी में आपकी मासूमियत की झलक साफ नज़र आती है पर इसमें किसी भी प्रकार की अपरिपक्वता नहीं . आप से हम भी सीख लेते हैं और ज़िंदगी जीने के आपके हौसले को नमन करते हैं. बहुत खूब !
    - आदित्य अवस्थी

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  11. Awesome read . Too bold and satirical but that is 'Rishabh Shukla' and i love you for the way you are.


    your biggest fan <3 <3

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  12. अब तक की सबसे खतरनाक पोस्ट आपके खतरनाक ब्लॉग पर . बधाई
    मज़ा आ गया . आपके अनुभवों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला .
    'हाजमोला' वाली बात दिल को छू गई ऋषभ जी

    - गौरव

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  13. Rani Sachdeva , Surat19 May 2013 at 05:29


    rishabh views on modern society is a mirror of our society which never tells a lie but the reality is really horrible but its reality . i can only say that such indeeds are the way of life . i also suffered a lot because of my family and above all my relatives ... some of my relatives are soooo disguisting that i cannot tell how much i get depressed because of their attitude and over interfering nature . i get a lot of good points and tips on how to deal with such rubbish people by your fabulous blog .. please please please keep updating such revolutionary blogs because most of the people like me need them the most .
    thanks once again ..you are doing a great job . may god bless you .
    and I LOVE YOU .beacuse you are someone to whom everybody loves to love

    - Rani Sachdeva , Surat

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