Friday, 3 August 2012

सीता की अग्निपरीक्षा





  सीता की अग्निपरीक्षा

'रामायण' हमारे प्राचीन भारत की महागाथा .धर्म की अधर्म पर विजय की गाथा . कर्त्तव्यों , ज़िम्मेदारी, वचन, मर्यादा, छल, वीरता, पौरुष ,संघर्ष की कहानी. यूँ तो रामायण में समस्त पात्रों की अहम भूमिका है . परंतु मेरे अनुसार रामायण का केन्द्र बिंदु देवी सीता हैं. पूरी कहानी उन्हीं के इर्द-गिर्द है. सौंदर्य, पतिव्रत, धर्म, त्याग व स्नेह की प्रतिमूर्ति सीता का चरित्र आज भी प्रासंगिक है. राम की शक्ति हैं सीता, सौंदर्य का पर्याय हैं सीता. माना जाता है कि सीता के सदृ्श सौंदर्यवती का जन्म न उनके पूर्व हुआ था न पश्चात में. शोभा की निधि होने के बावजूद पतिव्रत, त्याग एवं स्नेह की साक्षात प्रतिमूर्ति सीता जी का उज्जवल चरित्र हमेशा से ही महिलाओं के लिये अनुकरणीय है.

राम जिस शक्ति से मनुष्य से भगवान बने उन सीता का नाम राम के पहले आता है. रावण के वैभव और वीरता के प्रसंगो से भी देवी सीता का मन नहीं डोला . सीता जी के ओज , वीरता , दृ्ढ़ निश्चय के आगे रावण का भी आत्मविश्वास हिल गया था.

धरती से प्रसूत हुईं  देवी सीता लावण्या थीं . वे साहसी, स्वाभिमानी, वीर, संयमी, दयालु व आत्मविश्वास से परिपूर्ण थीं . परंतु आज के समय की विडंबना तो देखिये कि देवी सीता द्वारा दी गई अग्निपरीक्षा की परिभाषा ही बदल दी गई है. आज सीता की अग्निपरीक्षा का अर्थ यह समझा जाता है कि सीता की तरह हर स्त्री को अपने जीवन में अग्निपरीक्षा तो देनी ही पड़ेगी .

सीता ने अग्निपरीक्षा दी क्योंकि उन्हें पता था कि वे पवित्र हैं . फिर भी यह उनका स्वाभिमान था कि भविष्य में कोई उनके चरित्र पर लांछन लगाने की हिम्मत ना करे . देवी सीता ने विषम परिस्थितियों में भी अपना पतिव्रत धर्म नहीं त्यागा. वे अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछे कभी ना हटीं. चाहे फिर अपनी स्वेच्छा से राम के साथ 14 वर्षीय वनवास का दृ्ढ़ निश्चय हो या रावण की कैद में भी स्वाभिमान व साहस के साथ अपने पतिव्रत धर्म का पालन करना हो.

आज के परिवेश् में अग्निपरी़क्षा की परिभाषा ही बदल दी गई है. आज के समाज में लोगों की विकृ्त मानसिकता के कारण स्त्रियों को अग्निपरीक्षा की दुहाई दी जाती है और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे पग-पग पर खुद को सही व पवित्र होने का साक्ष्य दें. विरोध करने पर हमारे पुराणों की, सीता की अग्निपरीक्षा की याद दिलाई जाती है .फिर पति चाहे कितने ही ऐबों से लेस हो  परंतु पत्नी को वो सीता जैसी होने का भाषण देने में कोई गुरेज नहीं करेगा.

कुछ समय पूर्व आई फिल्म 'लज्जा ' में इस मुद्दे को बड़ी ही गंभीरता से उठाया गया था कि काश ! सीता अग्निपरीक्षा न देतीं , तो आज औरतों को पग-पग पर अग्निपरीक्षा न देनी पड़ती. काश ! कोई राम से भी कहता अग्निपरीक्षा के लिये. फिल्म में आवाज़ उठाने वाले पात्र को जनता पीट-पीट कर अधमरा कर देती है .जैसा फिल्म में दिखाया गया वही हमारे समाज का कटु सत्य है. परंतु मुद्दा यह नहीं कि यदि सीता ने अग्निपरीक्षा दी तो आज हर स्त्री को अग्निपरीक्षा देनी होगी, ये धर्म कहता है ...... धर्म यह नहीं कहता क्योंकि अग्निपरीक्षा के बाद जब एक अधम जीव की बात पर राम ने देवी सीता को त्यागा तब उन्होंने पूर्ण स्वाभिमान के साथ प्रतिकूल परिस्थितियों में अकेलेदम अपनी संपूर्ण ज़िम्मेदारियों का साहस व स्वाभिमान के साथ पालन किया . देवी सीता ने न केवल दो बच्चों लव व कुश को जन्म दिया बल्कि उन्हें उपयुक्त शिक्षा- दीक्षा देकर योग्य बनाया. ये सीता की ही वीरता, संघर्ष , अनुभव, स्वाभिमान व साहस था कि लव-कुश जो कि मात्र सात-आठ वर्ष के बालक थे, उनके पराक्रम का लोहा भगवान राम ने भी माना, जिनके ओज, पौरुष व पराक्रम के पीछे परवरिश थी देवी सीता की.

उसके बाद जब राम ने सीता जी से पुन: अयोध्या वापस आने का आग्रह किया तब भगवान राम की इच्छानुसार वे दरबार गईं परंतु पुन: अग्निपरीक्षा नहीं दी अपितु सीता जी का ये स्वाभिमान ही था कि अपनी समस्त ज़िम्मेदारियों, कर्त्तवयों को पूर्ण कर वे धरती में समा गईं. वो उनका पतिव्रत ही था कि उनकी पीड़ा देख स्वयं धरती ही फट गई... धरती से जन्मीं और धरती में ही लीन हो गईं महापराक्रमी जनकसुता देवी सीता.

रामायण में सीता जी का चरित्र ही मुख्य है. रावण जैसे अहंकारी व विनाशी राजा की मृ्त्यु व सर्वनाश का कारण हैं सीता. अपनी पवित्रता व स्वाभिमान की रक्षा की परिचायक हैं सीता , स्त्री शक्ति की द्योतक हैं सीता. श्री सीताजी का चरित्र अति दिव्य है, उनकी प्रत्येक लीला दिव्य है.

देवी सीता से हमारे समाज को यह सीख लेनी चाहिये कि विषम परिस्थितियों में भी पूर्ण स्वाभिमान के साथ अपनी ज़िम्मेदारियों का पालन करना ही आदर्श जीवन की परिभाषा है. और देवी सीता से यह सीख स्त्रियों के साथ -साथ पुरुषों को भी लेनी चाहिये न कि अग्निपरीक्षा के सही मायनों को दरकिनार करके पग-पग पर स्त्री को अपनी पवित्रता का साक्ष्य देने के लिये बाध्य करने की नीचता करनी चाहिये .

धर्म के ठेकेदारों को व अपने स्वार्थ और स्वयं की नीच मानसिकता के चलते स्त्रियों को सीता की अग्निपरीक्षा की दुहाई  देने से पूर्व सर्वप्रथम पूरे होशो-हवास में रामायण का पुन: अध्ययन करना चाहिये खासकर सीता जी की जीवन गाथा का पुन: अध्ययन करें और उसके बाद ही लोगों को  हमारे पुराणों व सीता की अग्निपरीक्षा की दुहाई देने की चेष्टा करें. 


                             - ऋषभ शुक्ल






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4 comments:

  1. wow.......beautiful & very well written ....totally agreed with your views .

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  2. savita deshpandey29 November 2012 at 04:34

    courageous opinions ! kudos to blogger !!

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  3. nice thoughts..logical post

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  4. very well written & inspiring....

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