Friday, 3 August 2012

रोडीज़ बना रोड्छाप



 रोडीज़ बना रोड्छाप

MTV पर आने वाले बहुचर्चित या कहें बेहद बदनाम सीरिअल रोडीज़ आज ज्यादातर युवाओं की पसंद है. इस शो ने युवाओं की भाषा , उनकी अभिव्यक्ति सब बदल दी है .एक ही पल में दीन तो दुसरे ही पल में लड़ाकू , एक ही पल में अपनी सफलता में मस्त होकर झूमने वाले तो अगले ही पल असफल होकर रोने वाले. गाली-गलौज में पी. एच.डी. होल्डर, निर्लल्ज , हठीले, बेधड़क युवा रोडीज़ के लिये पाँच-पाँच साल इंतजार करते हैं, इसमें आने के लिये बेहद मेहनत करते हैं .शो के लिये ट्यूशन तक लेते हैं. रघु- राजीव से बेइज्जत होने के बावजूद उनकी पूजा करते हैं. बचपन में तो वे दर्शक होते हैं पर अब इस शो के नायक बनना चाहते हैं ...सीन में घुस अपने आप को दुनिया भर में प्रसिद्ध करने की होड़ में वो सब कुछ करते हैं जिससे शो के अंतर्गत कैमरा उनके इर्द- गिर्द घूमता रहे और रातों रात वे टी.वी के हीरो बन जाएं . कल्चरल पिछड़ापन , संकुचन, मोरल मर्यादावाद, माता-पिता के आज्ञाकारी युवा यहाँ नहीं टिक सकते . 


रोडीज़ में 'बीप' ध्वनि अधिकतर सुनने में आती है क्योंकि शो में युवा एक दुसरे के लिये जमकर अभद्र भाषा का उपयोग करते हैं जिन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानो गालियों की कोई प्रतिस्पर्धा सी छिड़ गई हो और शो के अंत में अक्सर युवा ये कहते नहीं थकते कि ये ज़िंदगी की सच्चाई है... "This is Reality". रोडीज़ शो ज़िंदगी की ऐसी सच्चाई को प्रदर्शित करता है जहाँ टैलेंट के नाम पर नाटक, दिखावा, ड्रामेबाजी , नौटंकी, अश्लीलता व नग्नता का बोलबाला होता है.


 रोडीज़ में आए युवा यहाँ टिके रहने अर्थात सर्वाइवल के लिये एक दुसरे को रिझाने से लेकर धोखा देने तक सारे हथकण्डे अपनाते हैं ताकि शो के अंत तक बने रहें. रोडीज़ में आपको युवाओं की टास्क के दौरान उनकी बहादुरी से सीख लेने से ज्यादा अनैतिकता, अमानवीयता एवं फूहड़ता का दामन थामे आगे बढ़ने की सीख ज्यादा मिलती है. गौरवतलब है कि भारत के युवा वर्ग का जो निराशाजनक चेहरा रोडीज़ में दिखाया जाता है वह अत्यंत दुखद है.


रोडीज़ में अधिकतर् अभद्र व्यवहार, अभद्र भाषा, गाली-गलौज,  हाथापाई, एक दूसरे पर कीचड़ उछालना, धोखेबाजी, आरोप-प्रत्यारोप, अभद्रता, अश्लीलता के दृश्य दिखायी देते हैं जिनकें केन्द्र में इस देश का भविष्य कहलाने वाले युवा वर्ग होते हैं. हालाकिं रघु राजीव द्वारा इंटरव्यू में युवाओं के समक्ष ऎड्स जैसे मुद्दों पर सवाल उठाना, युवाओं की गलत सोच और बेबुनियादी व बेहूदे रवैये व ओवर स्मार्टनेस पर उन्हें डांटना कुछ हद तक सराहनीय था किंतु अपनी ऊँची अवाज़ में और टीम के साथ युवाओं का हद पार तक मज़ाक उड़ाने को शो की टी.आर.पी बढ़ाने के लिये हथियार के तौर पर उपयोग करना बेहद निंदनीय है. 


रोडीज़ शो में नग्नता की सारी हदें जिस बेशर्मी से पार की जाती हैं वो इसको बनाने वालों की मानसिक विकृ्तियों को ही दर्शाता है ... पिछले कई सीज़न्स से पुरुष नग्नता Male Nudity को इस शो में बेहद बढ़ चढ़ कर दिखया जाता है, फिर चाहे सीज़न - 4 में रुपाली आनंद द्वारा राज रॉय के फुहारा स्नान[नहाने] के वक्त बाथरुम का दरवाज़ा तोड़ना हो या सीज़न - 5 में एक ऐसे प्रशनावली का आयोजन हो जिसमें पूछे गए प्रश्न के हर गलत उत्तर पर लड़कों को एक-एक कर अपने कपड़े उतारने की शर्त के तहत टास्क पूर्ण करना हो.  सीज़न- 8 में तो बेशर्मी की सारी हदें तब पार हो गईं जब लड़कों को पूर्णतया नग्न होकर उनका रुपचित्र ब्राजील की जनता के सामने बनवाने का टास्क दिया गया.  मोहित ने बेहद बेशर्मी से हँसते-हँसते ये टास्क पूरा किया जिसके बाद उन्होंने  रघु का दिल जीत लिया और उनकी नज़र में इज्जत पाई व मोहित के इस कृ्त्य की बेहद सराहना की गई. इसके उलट सूरज जिसने यूँ सरे आम नग्न होने के टास्क को करने से साफ इंकार कर दिया , उसको सबकी गालियाँ सुनने की त्रासदी सहनी पड़ी , भले ही उसने एक बूढ़े आदमी के शरीर पर लगी मिर्च को चाटने वाले टास्क को पूरा किया जो नंगे खड़े होने से ज्यादा तकलीफदेय था  पर उससे क्या होता है. ... रघु की इज्ज्त और सराहना तो उसे तब मिलती जब वो अपने नग्न शरीर की सरेआम  नुमाइश करता .
रघु-राजीव जो रोडीज़ का चेहरा हैं ...उनके खुद का रवैया इतना गैर-ज़िम्मेदाराना है कि उनके ही शो में आए प्रतियोगियों की शर्ट का कॉलर पकड़ने व उनको गाली गलौज कर खुद को शो का सुपर हीरो सिद्ध करने में उन्हें कोई गुरेज या शर्म नहीं आती .


मुझे नहीं मालूम कि रोडीज़ के नए सीज़न का विजेता कौन बना और जानने की कोई इच्छा भी नहीं क्योंकि रोडीज़ जैसे अश्लीलता भरे गंद मचाते शो को देखना मैं, अपने कीमती समय की बर्बादी व तौहीन समझता हूँ. 


कहा जाता है कि ये दुनिया बड़ी अजीब है. यहाँ किसी एक  की तकलीफ दूसरे के लिये तमाशा होती है दूसरों के झगड़े , लड़ाई, और पीड़ा में लोगों को हमेशा से ही रस मिलता है . लोगों की इसी सोच का फायदा उठाकर रोडीज़ जैसे शोज़ का निर्माण होता है जिनकों अश्लीलता , बेशर्मी , ड्रामेबाजी, अभद्रता से लेस कर लोगों के सामने परोसा जाता है और लोग इन्हें बार - बार देख प्रफुल्लित होते हैं . इस प्रकार की बातों और शोज़ को देख प्रसन्न होने वाले कहीं न कहीं मानसिक विकारों के शिकार होते हैं जिन्हें मनोरंजन की सही परिभाषा क्या होती है , ये तक मालूम नहीं.

आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :
 

                                              - ऋषभ शुक्ल

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3 comments:

  1. awesome post ...keep going bro

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  2. You are so totally, absolutely, incredibly right.

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  3. Thank you for sharing- it is so interesting to read your views on modern society
    -jennifer

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