Friday, 31 August 2012

खास मुलाकात :








............ क्योंकि पँखों से नहीं , हौसलों से उड़ान होती है .

ज़बूत हौसलों के साथ आगे बढ़ने का इरादा, निस्वार्थ भाव से समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने का जुनून व महिलाओं के अधिकारों व मान-सम्मान के लिये सब कुछ न्यौछावर कर देने का जज़्बा .शायद ये कुछ वाक्य भी कम पड़ेंगे समर्थ समाज सेविका व 'सखी केन्द्र' प्रमुख सुश्री नीलम चतुर्वेदी के व्यक्तित्व को परिभाषित करने के लिये .
प्रस्तुत हैं इस चिट्ठे में सुश्री नीलम चतुर्वेदी से मेरी बातचीत के कुछ अंश :-



प्रश्न :  समाज सेवा से आप सक्रिय तौर पर जुड़ी हुई हैं. इसकी शुरुआत कब और कहाँ से हुई व किस प्रकार समाज सेवा के क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली ?

उत्तर: समाज सेवा की शुरुआत मैंने 16 वर्ष की आयु से ही कर दी थी .इसकी प्रेरणा मुझे मेरे पिता से मिली. उस समय जब स्वदेशी कॉटन मिल के कर्मियों का शोषण हो रहा था , तब उनकी व्यथा सुन मेरे भीतर ये इच्छा जाग्रत हुई कि मैं भी इनके लिये कुछ करुँ .फिर क्या था स्कूल ड्रेस व बैग के साथ सुबह-सुबह मैं मिल पे जाती और विभिन्न गीतों के द्वारा उनकों अपने अधिकारों के लिये लड़ने की प्रेरणा देती. साथ ही साथ पढ़ाई भी चालू रही. पर हर वक़्त मेरा दिल व दिमाग समाज सेवा के लिये सोचता रहता . मैं, बचपन से ही किताबें पढ़ने की शौकीन थी. मात्र 14 वर्ष की आयु में मैंने ' अग्नि दीक्षा' , 'लाल रेखा', जैसी किताबें पढ़ीं. इन किताबों के क्रांतिकारी चरित्रों से भी मुझे बहुत हौसला मिलता था. लोगों को प्रेरणादायक भाषण देता देख एक बार मैंने भी अनुरोध किया कि मैं भी कुछ बोलना चाहती हूँ . बस फिर क्या था मैं मंच पर चढ़ी और मैंने कहा कि " यदि ' मिल ' में काम करने वाले मज़दूरों के साथ अनैतिक व्यवहार करके बड़े अफसर ये सोचते हैं कि हम टूट जाएंगे और आंदोलन को किनारे कर देंगे तो मैं ये कहती हूँ कि वे ऐसा सोचना भी भूल जाएं क्योंकि मज़दूर न टूटेंगे , ना अपना हौसला तोड़ेंगे क्योंकि मैं हूँ उनके साथ और हम  सब मिल के अपने अधिकारों की लड़ाई जीत कर रहेंगे ." ये सुन कर सारे मज़दूरों का एवं वहाँ उपस्थित लोगों का हौसला बढ़ा व तालियों की गड़गड़ाहट से मंच गूँज उठा . इस वाक्ये ने मेरा हौसला और मज़बूत किया . फिर क्या, मज़दूरों के अधिकारों की लड़ाई से मैं, तब तक जुड़ी रही जब तक उन्हें उनका हक नहीं मिल गया. इससे मेरी हिम्मत और बढ़ी . उसके बाद लाठी लेकर शराब की मटकियाँ फोड़ीं.  न्याय के लिये धरना प्रदर्शन किया. विक्टोरिया मिल् में 12 दिन आंदोलन भी किया. उस दौरान रात- रात भर मज़दूर महिलाओं को भी भाषण देना सिखाया ताकि वे अपनी बात दूसरों के समक्ष प्रस्तुत कर सकें. दिन पर दिन हौसला बढ़ा , जुनून बढ़ा तो एक संगठन तैयार किया और फिर क्षेत्रीय कमेटी बनाई. और इस प्रकार 'महिला मंच' व 'सखी केन्द्र' की नींव रखी. धीरे धीरे लोगों का मुझमें विश्वास बढ़ा और फिर राष्ट्रीय स्तर के बाद अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी समाज सेवा से जुड़े कार्य किये.


प्रश्न :  आपने बेहद कम उम्र से ही समाज सेवा के लिये कदम बढ़ाये. शुरुआत में किस प्रकार की कठिनाईयों का सामना करना पड़ा ?

उत्तर :  परेशानियाँ  तो जीवन का अंग हैं .किसी भी अच्छे कार्य को जब आप शुरु करते हो तो कठिनाईयाँ तो सामने आती ही हैं . पर ऐसी स्थिति में आप की दृ्ढ़ निश्चयी सोच ही आपको सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ाती है . शुरुआत में कम उम्र के कारण जब मैं स्कूल ड्रेस में मज़दूरों को न्याय दिलाने के लिये अनाज इकट्ठा करने जाती तो कई बार अपशब्दों  का सामना करना पड़ता .बहुत दुख होता था तब . कुछ लोगों ने तो तब मेरे प्रयासों को भीख माँगने का भी नाम दे दिया था. शुरु -शुरु में जब किसी महिला के साथ हुए जुर्म के खिलाफ लड़ने व आवाज़ उठाने के लिये मैं उनके परिवार को समझाती तो लोग मुझे उनके घर से बाहर जाने का रास्ता दिखाते . उन लोगों के लिये तब बलात्कार जैसे शब्दों को मुँह से बोलना भी बेशर्मी कहा जाता था. तब लगता था कि मुँह से शब्द निकालना बेशर्मी है , अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना बेशर्मी है या अपनी ही बहु - बेटियों के साथ हो रहे अन्याय को या बलात्कार जैसे घिनौने अपराधों को चुपचाप देखते रहना बेशर्मी है . खैर, इन बाधाओं ने मेरे हौसले ना तोड़े . पर कभी-कभी तो मैं इतनी हतोत्साहित हुई कि ऐसा लगा कि ज़िंदगी में कुछ न् कर पाऊँगी पर पिताजी ने मुझे प्रेरणा दी और मैं फिर आगे बढ़ी.

प्रश्न :  आपकी संस्था 'सखी केन्द्र' की कार्यप्रणाली से हमें अवगत करायें.

उत्तर: 'सखी केन्द्र ' के द्वारा हम महिलाओं की भय, कमजोर, असुरक्षा एवं हीन भावना की ग्रन्थियों को खत्म कर उनकी क्षमताओं को बढ़ाने और उनमें 'हम' की भावना का विकास कर , उन्हें एक ऐसी प्रक्रिया में ढालते हैं जहाँ वे अपना जीवन स्वयं गढ़ सकें और महिलाओं को अपने अधिकारों को कर्त्तव्यों के साथ समझते हुए , एक सुंदर स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकने की प्रेरणा देते हैं जिसके अंतर्गत हम आश्रय केन्द्र, परामर्श केन्द्र, कानूनी सहायता, आपातकालीन महिला हेल्प लाइन, लाइब्रेरी, स्वयं सहायता समूह, व्यक्तित्व विकास एवं व्यवसायिक प्रशिक्षण जैसे कार्यक्रमों को संचालित करते हैं.





प्रश्न :   महिला मंच क्या है और ये किस प्रकार महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने में सहायक है?
 
उत्तर :   'महिला मंच उत्तर प्रदेश' की शुरुआत 1977 में हुइ जो कि एक प्रादेशिक संगठन है जो उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं के मानवाधिकारों को लेकर काम कर रहा है. जिसके द्वारा हम महिला हिंसा से जुड़ी समस्यायें, लैंगिक असमानता , गरीबी, बेरोजगारी , जातिवाद, साम्प्रदायिकता व इंसानियत से जुड़ी सभी समस्याओं के खिलाफ लोगों को जाग्ररुक कर उन्हें संगठित कर जन आंदोलन चलाने के प्रयास करते हैं . महिला मंच का मुख्य उद्देश्य एक हिंसा मुक्त् व  खुशहाल समाज की स्थापना करना है .






प्रश्न :   महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये भविष्य में और क्या योजनाएं हैं?

उत्तर :   भविष्य में हम हिंसा को जड़ से उखाड़ फेकने का प्रयास करेंगे . हमें सामाजिक न्याय चाहिये , लैंगिक भेदभाव को खत्म करने की दिशा में कार्य करेंगे .प्रयास तो यही रहेगा कि और भी लोग व आने वाली पीढ़ी भी हमारे साथ जुड़े ताकि हम मिलकर एक हिंसा मुक्त समाज की स्थापना कर सकें. जिससे लोग सहज साँस  ले सकें व खुशहाल जीवन जी सकें.

प्रश्न :   पाठकों व जनता के लिये कोई संदेश ?

उत्तर :  पाठकों व जनता को मैं यही संदेश देना चाहूँगी  कि  हमारी लड़ाई पुरुषों के खिलाफ नहीं है बल्कि हम पितृ्सत्तात्मक सोच के खिलाफ हैं . ये पितृ्सत्तात्मक सोच न केवल पुरुषों में बल्कि महिलाओं के साथ-साथ पूरे समाज में उपस्थित है. महिलाओं को स्वयं जाग्ररुक होना पड़ेगा और आगे आना होगा . इसके अलावा बेटी - बेटे में असमानता न करें . लड़कों के साथ-साथ लड़कियों को भी आत्मनिर्भर बनायें . पति-पत्नी को एक दूसरे का अभिन्न अंग बनना होगा  .पति - पत्नी एक दूसरे के अच्छे दोस्त बनें ताकि आने वाली पीढ़ी में अच्छी व सकारात्मक सोच का विकास हो सके जिससे एक सुदृ्ढ़ समाज की स्थापना हो सके.


" नीलम जी , अपना बहुमूल्य समय हमें देने के लिये आपको हृ्दय से धन्यवाद ."







देखा ब्लॉग दोस्तों ....इसे कहते हैं हौसला...... क्या सटीक व क्रांतिकारी विचार हैं नीलम जी के, जो किसी के भी भीतर हिम्मत , लगन , आशा व कुछ कर गुज़रने की शक्ति भर दें . सुश्री नीलम चतुर्वेदी जी द्वारा किये जा रहे सामाजिक कार्यों व प्रयासों की हम प्रशंसा करते हैं व उनको बहुत-बहुत शुभकामनायें इस विश्वास के साथ कि उनके सार्थक प्रयास रंग लायें ,व सकारात्मक सोच व उच्च आदर्शों से युक्त समाज में हम शांति व प्रेम के साथ जी सकें.           

{ 'सखी केन्द्र' प्रमुख सुश्री नीलम चतुर्वेदी जी से मौखिक बातचीत के बाद मामूली संपादन के बाद इस साक्षात्कार को प्रकाशित किया जा रहा है .}

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                                   - ऋषभ शुक्ल

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2 comments:

  1. very inspiring story ..thanks for sharing

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  2. GREAT INTERVIEW..REALLY INSPIRING..CONGRATS!

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