Friday, 3 August 2012

मीडिया : माध्यम संचार का या नकारात्मकता का ?

मीडिया : माध्यम संचार का या नकारात्मकता का ?

This was an article that never saw the light of day.  Because the Editor chickened. Said it was  too dicey & controversial for the magazine. करीब एक साल छः महीनों  तक इंतजार के बाद , ये article मेरी फाइल से खोने की कगार पर था. Then, I decided  to share this axed  article with my lovely  Blog audience. So, I request you all to please go through this article & tell , what would you have done if you were in the Editor's place???????
 



ज की दौड़ती -भागती ज़िन्दगी में बहुत कुछ बदल गया है . दिन प्रतिदिन हमारा समाज अनेकों बदलावों से रुबरु हो रहा है और ये बदलाव आज पूरी दुनिया में देखने को मिल रहे हैं. ग्लोबलाइजेशन के आज के दौर ने सूचना एवं संचार के माध्यम को भी आश्चर्यजनक परिवर्तनों से ओत-प्रोत कर दिया है. नि:संदेह इसके बहुत से सकारात्मक पहलु देखने को मिलते हैं. आज इलेक्ट्रानिक मीडिया की यदि बात करें तो आए दिन एक नया न्यूज चैनल टी.वी पे दस्तक देता है व भीड़ में अपना वज़ूद खोजता नज़र आ रहा है. लोगों को भी घर बैठे बस रिमोट की बटन दबाते ही देश -विदेश की सचित्र जानकारियाँ प्राप्त होती हैं. आज इलेक्ट्रानिक मीडिया राजनीति, खेल , मनोरंजन, आध्यात्म आदि ,हर पहलुओं को अपने दर्शकों के सामने प्रस्तुत करता है.परंतु प्रतिस्पर्धा के बढ़ते दायरे में जहाँ कुछ न्यूज चैनल आज भी सूचना एवं संचार के नियमों के दायरे में रह्कर , पूर्ण नीति नियमों के तहत प्रतिस्पर्धा की दौड़ में भी अपनी सफल उपस्थिति दर्ज करा के अपना परचम लहरा रहे हैं वहीं इसी भीड़ में कुछ न्यूज चैनल की यदि बात करें तो मात्र अपने न्यूज चैनल  की ओर दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने के लिये व टी.आर.पी की रेस में दौड़ते-दौड़ते सूचना व संचार के माध्यम को मात्र हँसी मज़ाक के विषय के तहत प्रस्तुत कर स्वयं मीडिया को ही उपहास का विषय बना रहें हैं. इस संदर्भ में सिर्फ दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने हेतु न्यूज को सनसनीखेज़ तरीके से प्रस्तुत करना, साधारण सी न्यूज में भी मिर्च मसाला लगा के प्रस्तुतिकरण के तरीकों की भी धज्जियाँ उड़ाने वाले ये न्यूज चैनल खुद को बेशर्मों की तरह अव्वल बताने से भी नहीं कतराते . और तो और ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर हमारे  प्राचीन ग्रंथों की कहानियों को भी तोड़ मरोड़ कर अपनी न्यूज के साथ प्रस्तुत करने में कदापि पीछे नहीं रहते. उदाहरण के तौर पर यदि न्यूज है कि 'तालाब में मछलियों की बेवजह मौत से सनसनी' तो आप ब्रेकिंग न्यूज के नाम  पर इसी न्यूज की हेड्लाइंस को कुछ इस अन्दाज़ में देखेंगे: 'तालाब में दिखे यमराज'....कहने का सबब यह है कि खबर को सनसनीखेज़ तरीके से प्रस्तुत करने की होड़ में कुछ न्यूज चैनल्स ने देवी देवताओं को भी नहीं छोड़ा ..... और दर्शकों की भावनाओं व उनके विशवास के साथ खिलवाड़ करने पर भी उन्हें कोइ गुरेज़ व शर्म नहीं आती. आधुनिकता की रेस में सिर्फ स्वयं के न्यूज चैनल को दूसरे से बेहतर दिखाने के लिये ऎनिमेशन टेक्नोलॉजी ( चित्रों को चलित रुप दिखाने की तकनीक ) का गलत उपयोग ऐसे ही न्यूज चैनल्स की देन हैं. न्यूज न मिलने पर मात्र 5 मिनट की किसी बेबुनियादी खबर को भी भड़कीले शब्दों व अजीबोगरीब आवाज़ में एक घंटे तक सस्पेंस बनाए रख घसीटना.....ये बेहूदगी भरे तरीके सिर्फ और सिर्फ सूचना व संचार के माध्यम का अपमान ही है....या अपने नकारेपन को छिपाने की बेअसरदार कोशिशें....इसी प्रकार यदि अन्य उदाहरणों पर गौर करें तो अभी कुछ समय पूर्व अभिनेता सलमान खान की शादी कब होगी? इस प्रश्न को जितना कुछ न्यूज चैनल वालों ने शोध का विषय बनाया उतना तो शायद सलमान खान के परिवार वालों या खुद सलमान खान ने भी न सोचा होगा......दर्शकों का ध्यान अपने चैनल की ओर घसीटने के लिये व न्यूज को ग्लैमराइज़ करने के लिये , सलैब्रिटीस की लाइफ में ओवर इंटरफेरेंस करना और उनके कथनों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करना तो कुछ न्यूज चैनल्स का सबसे बड़ा हथियार होता है.
 इसके अलावा कुछ न्यूज चैनल्स तो ऐसे भी आ गए जो ज्योतिष जैसी पवित्र विद्याओं के नाम पर पिता अपने पुत्र को कैसे वश में करें , पत्नी अपने पति को कैसे वश में करे ,सफलता व धन कमाने के शार्ट कट तरीकों को बता कर ज्योतिष के नाम पर दर्शकों में अंधविश्वास भर रहें हैं....परंतु शुक्र है कि आधुनिकता की इस भागमभाग में आज भी कई न्यूज चैनल्स संपूर्ण नीति नियमों के तहत कार्य कर अपने व मीडिया के गौरव को बरकरार रखने में सफल हैं और आशा है कि भविष्य में भी मीडिया के बेहतरीन स्तर को कायम रखेंगे परंतु खबर के नाम पर मात्र सनसनी पैदा करने पर , दर्शक अपना कीमती समय कुछ वक़्त तो ऐसे घटिया न्यूज चैनल्स को देखने में दे सकते हैं पर सूचना व संचार के माध्यम में यूँ गंद मचा कर ज्यादा दिनों तक दर्शकों को रिझाया नहीं जा सकता...बेहतर होगा ऐसे न्यूज चैनल्स वालों को अपने अधिकारों , कर्त्तव्यों , मीडिया के रोल व कार्यक्षेत्र पर पुन: विचार व विश्लेषण कर नए सिरे से वक़्त रहते स्वयं को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिये वरना मीडिया के नाम पर केबल हँसी मज़ाक करते रहने वाले ऐसे न्यूज चैनल्स के लिये परिणाम इतने घातक भी हो सकते हैं कि वो दिन भी दूर नहीं होगा जब ऐसे न्यूज चैनल्स पर आखिर में दिखेगा तो सिर्फ एक बड़ा ताला.

आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों के इंतजार के साथ , आपका :        
 
                                                                     
                                                                                        - ऋषभ शुक्ल

copyright©2012Rishabh Shukla.All rights reserved



2 comments:

  1. Great info! It’s nice to see someone who share his views in a logical and useful way.
    -Rinki sharma

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  2. SOME MEDIA PPL SUCKS...

    GREAT BLOG & GREAT ANALYSIS

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