Friday, 3 August 2012

मेरे विद्यालय के खिलाफ मेरी आवाज़

मेरे विद्यालय के खिलाफ मेरी आवाज़ :






पेरेंट्स को नोटिस :

पने कलम की धार को आज मैं अपने ही विद्यालय के खिलाफ इस्तेमाल करने जा रहा हूँ. आपमें से कई लोग कहेंगे कि क्या मुझमें शर्म नहीं ? इसका उत्तर है- "जी नहीं ! मैं बेशर्म हूँ. " क्योंकि अपने दिल की बात को जगज़ाहिर करना , यदि बेशर्मी है तो यही सही.......
हममें से ज्यादातर लोग कहेंगे कि उनके स्कूल डेस उनके जीवन के सबसे खूबसूरत पल थे. पर मैं कहूँगा कि वो मेरी ज़िन्दगी के सबसे बद्सूरत व मनहूस दिन थे. मैं अपनी ओर भी आप सबका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा कि मैं अपने विद्यालय का कोई महान या दूध का धुला छात्र न था.  शिक्षकों की ऊट -पटांग बातों के बदले ( जिन बातों की विवेचना मैं आगे करुँगा) , उनको जितना मैंने तंग किया है उतना शायद ही किसी अन्य छात्र ने किया हो. यहाँ मैं बात अपने विद्यालय में अपनी कक्षा 6 - 11वीं तक के शिक्षा काल की कर रहा हूँ.

यकीन मानिये आपमें से बहुत से लोग यह लेख पढ़ कर आश्चर्य चकित होंगे पर यह वो सच्चाई है जो काफी समय से मेरे ज़ेहन में पल रही है और कहीं न कहीं मेरी सोच को प्रभावित करती आई है और न जाने मेरे जैसे कितने ही विद्यार्थियों को कुंठाओं का विषपान करने को मजबूर किया होगा.

पहली घटना कक्षा 6 की है . उस कक्षा में हमारे सारे शिक्षक बदल गए थे जो प्रायः कक्षा 1-5 वीं तक हमें पढ़ाया करते थे.  उनकी इज्जत मैं, आज भी बहुत करता हूँ परंतु कक्षा 6 वीं के बाद भी काश कुछ शिक्षक मेरी निगाहों में अपनी इज्जत कायम कर पाते. हालांकि कक्षा 6वीं के बाद कुछ शिक्षक आज भी मेरे लिये आदरणीय हैं , परंतु कुछ शि़क्षक जिनके कारनामों की व्याख्या करने में जा रहा हूँ , उसे पढ़ कर आप भी कहेंगे कि ऐसे शिक्षकों से शिक्षा ग्रहण करने से भला अनपढ़ रहना ही भला.
हाँ जी, तो बात कक्षा 6वीं की है, एक दिन मैंने अपने विद्यालय से अवकाश ले लिया क्योंकि उस दिन मेरा जन्मदिन था. उस वक़्त हर बच्चे की कोमल मानसिकता में इस तरह के पर्वों की बहुत महत्ता होती है..परंतु अगले दिन जब मैं विद्यालय गया तो मेरे अबोध मन की जो धज्जियाँ उड़ाई गई, उसकी मैं क्या तारीफ करुँ.... साइंस विषय की मेरी शिक्षिका ने मेरे द्वारा ये कहने पर कि, "मैम ! मैं इसलिये कल नहीं आया था क्योंकि मेरा जन्मदिन था." मेरे ये बात कहने पर मेरी आदरणीय मैडम जी ने इस बात का इतना लंबा मुद्दा बनाया कि क्या कहूँ ? सबसे पहले उन्होंने मेरी बड़ी बहन को बुलाया , मेरे पेरेन्ट्स को नोटिस भेजने की बात की ...वगैरह वगैरह. वो उस वक़्त इतना बोले जा रहीं थी कि उफ्फ्!! मन में सीधे यही कुंठा व्याप्त हुई कि कहां से जन्मदिन मना लिया और अब ऐसा क्या करुँ जो इनकी जुबान पे कुछ वक़्त तक लगाम लग जाए....... खैर , मेरी बहन ने किसी तरह पेरेन्ट्स को नोटिस भेजने की बात तो टाली और  मुझे समझा दिया.
ठीक है विद्यालय में ऎबसन्ट् रहना गलत बात है पर  'ऎबसन्ट्' करने पर डांट लगाने की जगह पर 'जन्मदिन' मनाने की बात को इतना घसीटना ...कि अपने ही जन्मदिन से घृ्णा हो जाए.......खैर, जैसा की मैंने कहा था कि मैं दूध का धुला तो था नहीं .......कुछ दिनों बात हाफ़ यिअर्ली एगज़ैम्स [ परीक्षा ]  हुए जिसमें साइंस विषय में मेरे highest अंक  आए और मात्र मुझे और एक लड़्की को छोड़, अन्य सारे छात्रों के अंक बहुत खराब आए. मैड्म जी ने मेरे अंक 60 /100 काउंट करे थे बल्कि जब मैंने अपने अंक काउंट करे तो वो  79/100 थे . जब मैंने इस विषय में उनसे बात की तो वे स्तब्ध रह गईं और कहने लगीं कि ,"मेरे विषय में इतने ज्यादा मार्कस अभी तक किसी के नहीं आए और फिर अन्य छात्रों को मेरा और मेरी सह्पाठी का उदाहरण दिया और उनसे कहा कि अब सब अपने-अपने पेरेंट्स को बुलाएंगे व सबके घर नोटिस जाएगा."  मैंने भी मौके पे उनसे पुछ लिया कि, "मैम! मैं भी अब अपने पेरेंट्स को बुला लूँ? मुझे भी नोटिस भेजेंगी?"
कहीं न कहीं ये बातें मेरे दिल से हूक के रुप में बाहर निकली थीं , जब मेरे जन्मदिन मनाने पर उन्होंने मेरी बहन को बुला कर पेरेंट्स को नोटिस भेजने की बात कही थी. खैर , वक़्त बीतता गया , हर कक्षा में वो शिक्षिका ने जब तक मुझे पढ़ाया , उन्हें मेरे पेरेंट्स को नोटिस भेजने का कोई मौका मैंने नहीं दिया लेकिन हाँ , विद्यालय ऎबसन्ट् करने का नियम जरुर कायम कर लिया , जिसके लिये वो आगे कभी मेरे पेरेंट्स को नोटिस नहीं भेज पाईं.

मुझे आज भी वो वक़्त , वो पल याद है . मैं चाह कर भी नहीं भूल पाता.... कि क्यों उन्होंने मेरे जन्मदिन मनाने पर इतना  issue बनाया जबकि उन्हें डांटना ही था या नोटिस ही भेजना था तो ऎबसन्ट् करने को रीज़न बताना चाहिये था न कि मेरे जन्मदिन को ....क्या वो ये चाहती थीं कि मुझे अपने हर जन्मदिन पर शर्म आए या फिर अपने जन्म पर ही शर्म आए !!!!! 

लेख आगे जारी है......................

आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :

                                                      - ऋषभ शुक्ल

copyright©2012Rishabh Shukla.All rights reserved

3 comments:

  1. Each & every word of this article is awesome. you wrote what your heart said and you have very honest heart dear....Rishabh plz keep up your boldness, others may criticize you, but I do appreciate your BOLDNESS! Long way to go Rishabh, BE MORE BOLD!& I really like ur way of writing ...your literary work is very precious for your readers & hope to see such wonderful articles in near future too & above all a nice endeavor to fight against child abuse.....

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  2. 'prince of sarcasm' is the only title which occur in mind after reading this 'dhaansu' post ...but really u have done a work of bravery & i appreciated u for showing this courage to throw light on such things , happened in schools...really its pity to see the degradation of the level of education & the reason is only the selfish teachers & the weak administration of such schools....great post i must say dear & keep maintain your bold & courageous way of writing

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  3. Excellent post! Very encouraging

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