Thursday, 16 August 2012

घुटन


 घुटन - 01

भी वक़्त का ज़ख्म यूँ मिला हमें,
कि घुटन की चुभन हर वक़्त, हर पल , कुछ इस कदर हुई हमें,
बन गई रुह भी एक आवारा लाश की तरह,
जो घुटती तो है घुटन में, गर जिस्म छोड़ने को राज़ी नहीं.
मकबरे रुपी जिस्म ये मेरा , भी दूर नहीं होता इस आवारा रुह से
जाँ मेरी निकलने को होती है आतुर पर पीछे है एक अधूरापन .
ओह ! ये घुटन मेरी इस कदर हूक उठाती है,
साँसे मेरी थम कर रह जाती हैं पर काश ये घुटन की हूक ,
एक बार बाहर आ जाए मेरे दिल से ,
तो उस हूक के साथ जिस्मानी मकबरे के मोह में कैद ,
वो आवारा रुह भी बाहर आए मेरे जिस्म से .
पर ये घुटन सिर्फ और सिर्फ घुटाती है इतना ,
कि हम तरसे हैं , पानी कि एक-एक बूंद के लिये
उस वक़्त गर कुछ एहसास होता है,
तो बस होता है घुटन की घुटन का ,
घुटन की चुभन का.
जो पानी की एक बूंद से ला तो देती है जिस्मानी मकबरे में
वापस जां,
पर वापस जां के जिस्म में आ जाने से , मिला तो आखिर मिला भी क्या?
मिली तो हमें मिली बस घुटन की घुटन .


घुटन - 02

घुट- घुट के कब तक जिएंगे ये ज़िंदगी ,
खुशकिस्मती होती है उनकी ,
जिनको होती है कभी न कभी तो मौत नसीब .
घुटन भरी मौत भी कुछ हद तक दे जाती है ,
पलभर का सुकून कहीं ,
पर हमारी किस्मत अलग है ,
हमें तो नहीं होती है मौत भी नसीब .


घुटन - 03

रकर भी सुकून न होगा,
एक अधूरापन दिल-ए-ज़िगर में हरदम हरपल होगा.
अधूरी रह गई ज़िंदगी , अधूरे रह गये सपने.
अधूरे रह गये खुदा से किये हर एक वायदे,
अधूरे रह गये वो अफसाने,
अधूरी रह गई एक कहानी , जिसे पूरी कर खुदा को थी दिखानी .
ये अधूरापन हमें मरकर भी सुकून न देगा,
हरदम हरपल ये एक ज़ख्म नासूर बन
कर उमड़ता रहेगा.
तो गर मर भी गए हम तो आखिर मरकर भी क्या होगा?
जब मरकर भी हमें कभी चैन व सुकून न होगा.


घुटन - 04

घुटन का धुँआ कुछ इस कदर उठा,
कि मानो जिस्म व रुह का भी दम घुटने हो लगा.
तब आखिरकार वो घुटन दिल व दिमाग को चीरती हुई
होंठो से बनकर निकली हूक ,
घुटन की हूक थी वो ज्वालामुखी के उबलते लावे का रुप ,
जिसने छोड़ा हमारा जिस्म व रुह लेकर रुप हुंकार का
और बजा दिया शंख सर्व विनाश के आरंभ का .
उस हुंकार में था पूर्ण विराम !
पूर्ण विराम : बुराई, बुरी शक्ति , बुरे लोग, बुरे कर्म का,
पूर्ण विराम : अधर्म, हिंसा, अशांति व दुष्कर्म का.


घुटन - 05 { कश्मकश }

ये अजीब कश्मकश है ज़िंदगी की ,
जिंदगी की शुरुआत हुई कुछ धुंधली सी.
जब धुंध में झांक कर देखा हमने तो पाया,
दुश्मनी का कोहरा हर ओर,
दुश्मनी की आड़ में अपने बन के बेगाने ,
बिछाये थे षड़यंत्र , कुचक्र का जाल हर ओर .
अपने ही जब थे बेगाने तो बेगानों से क्या दिल लगाते .
बस दुश्मनी की आग कुछ इस कदर लोगों पर सवार हुई ,
कि मासूमियत कब इस दुश्मनी का शिकार हुई , इसका हमें अहसास नहीं.
काश अहसास इसका हो जाता हमें भी जल्द से जल्द
कि नहीं रखता कोई मोल अपनों के अफसानों का
इन बेगानों से क्या कहे , इन्हें तो चढ़ा है खुमार दुश्मनी निभाने का,
खुमार ये ऐसा चढ़ा है कि उतरेगा ये नहीं समझाने से ,
ये नशा तभी उतरेगा अंजाम इन सबका बिखाने से .
दुश्मनी एक तरफा नहीं निभती कभी,
पर इन कमजर्फों को क्या कहें
जो इस बात को समझे ही नहीं कभी.
लो नादान उम्र से ही पर उतर लिए दुश्मनी की आग में हम भी,
बना लिया दुश्मनी को अपना मुकद्दर
और अब देखेगी दुनिया आखिर क्या होता है
असलियत में दुश्मनी का खौफनाक मंजर.

घुटन - 06  { पूर्ण विराम }

जीब जंग है ये जिसमें रिश्ते ही उड़ा रहे हैं रिश्तों का मज़ाक ,
अपने ही कर रहे हैं अपनों पर वार
जीतना बड़ा है मुश्किल ये महासंग्राम , आखिर कैसे भुला दें
अपने अपनों को ही आज ?
लेकिन जब पलटते हैं इतिहास ,
तो सोचते हैं कि आखिर इन अपनों में कहाँ था ,
हमारे लिये वो अपनों का प्यार , इकरार , ममता और बलिदान.
मांग थी तो थी भी क्या कि बस लेनी है हमारी ही जान
ख्वाब थे उनके कि मारेंगे हमें तड़पा -तड़पा के, घुटा - घुटा के,
देंगे हमें जिल्ल्त , घुटन , तड़प व दर्द की हर एक सांस .
सड़क पे भीख मंगवाएंगे ,
ज़िल्लत की ज़िंदगी से हमारा हर पल हर दम साक्षात्कार करायेंगे,
कर देंगे हमारे अस्तित्व का ही विनाश , तभी तो बन पायेंगे वो भगवान.
तो आखिर कब तक सहें, कब तक घुटे ?
आखिर लड़ना तो होगा हमें भी ये संग्राम ,
जो है अपनों का अपनों के खिलाफ ,
उन अपनों के खिलाफ जिन्होंने उड़ाया है,
बनाया है हर एक रिश्ते का मज़ाक,
तो शीत युद्ध होगा हमारा हथियार
लड़ेंगे हम बिन हथियार पर फिर भी करेंगे दुश्मनों पर वार,
बनेगी हमारी खामोशी अब हमारी अवाज़ ,
देखेगी दुनिया खामोशी का विनाश ,
चूंकि हम घुटे .....हम तड़पे .... हम चीखे - चिल्लाए
कि आखिर कोई हमें हमारा गुनाह तो बता दे ,
पर दिल को यूं किश्तों में दर्द तो ना दे ,
पर तब तो छाया था दुश्मनी का आलम इस कदर ,
कि ताकत का नशा था, घमंड की मदहोशी थी ,
बेशर्मी की बुनियाद , बद्सलूखियों की मिसालें थीं,
तो क्या बताते जब दुश्मनी की कोई वजह ही न थी.
था तो बस शौक एक तरफा दुश्मनी निभाने का ,
मिटाना थ वजूद हमारा यही तो उनका मकसद था.
पर खुदा जिसके साथ हो ,
जिसका अस्तित्व ही खुद खुदा हो ,
कौन मिटा पाया है उसे?
हम तो कल भी थे, आज भी हैं और कल भी होंगे ,
चूंकि अब हर सांस की यही है मांग चाहिये उन्हें :
पूर्णविराम.                                                         

                                   - स्वप्निल शुक्ल


Posted by : Rishabh views on Modern Society




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2 comments:

  1. very nice poems , swapnil ....keep it up ..& rishabh....hats off to & thanks for sharing this lovely poem dear.....

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  2. This is my favorite post of your blog..... (Y)
    - anurag chauhan

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