Friday, 3 August 2012

मेरे विद्यालय के खिलाफ मेरी आवाज़ : 04

मेरे विद्यालय के खिलाफ मेरी आवाज़ : 04

हुर्र र र... करके हो जाते थे वो फुर्र र रर :

अपने कलम की धार को आज मैं अपने ही विद्यालय के खिलाफ इस्तेमाल करने जा रहा हूँ. आपमें से कई लोग कहेंगे कि क्या मुझमें शर्म नहीं ? इसका उत्तर है- "जी नहीं ! मैं बेशर्म हूँ. " क्योंकि अपने दिल की बात को जगज़ाहिर करना , यदि बेशर्मी है तो यही सही.
हमारे विद्यालय की सुबह प्रार्थना में प्रिंसिपल व अन्य हिन्दी भाषा के शिक्षक अक्सर भाषण देने लगते थे और बोलते -बोलते  कब उनकी आवाज़ चिल्लाहट में बदल जाती थी , उन्हें इसका पता ही नहीं चलता था. लंबे भाषण के बाद वो खुद नहीं बता सकते थे कि पूरे भाषण का निचोड़ क्या है..... और भाषण की शुरुआत सुबह प्रार्थना सभा से होती थी और अन्त होते- होते कई बार तो Interval हो जाता था .यानी की Lunch  से पहले के पाँच periods के समय में बच्चों को तपती धूप में अपनी चमड़ी उधेड़वानी पड़ती थी और फिर उन्हें  पाँच periods  मिस होने की त्रासदी सहनी पड़ती ........ इन बातों के अलावा ,एक  हमारे खेल- कूद के शिक्षक थे जिनका कार्य था केवल सावधान और विश्राम कराना और बस विद्यार्थियों को सीटी बजाकर हुर्र र र र........ करते रहना था .....लड़कियों के प्रति वो काफी ....काफी मतलब काफी संवेदनशील हुआ करते थे...लड़कों से तो उनका छ्त्तीस का आंकड़ा था...... खेल- कूद के शिक्षक के रुप में उनका कार्य केवल हुर्र र र... करके फुर्र र रर र .......  हो जाना था...बाद में उन्होंने अपना सावधान और विश्राम  व Wednesday की पी.टी करवाने का कार्य भी Prefect , captain , vice- captain  नाम के जीवों [ छात्र- छात्राओं ] को सौंप दिया ..... अब विद्यालय का अनुशासन बच्चे संभालते थे...पर हाँ , वो हमारे खेल- कूद के टीचर manage सब करते थे हुर्र र र र.... करके.

हिन्दी पखवाड़े के समय स्पेशल असेमब्लि [ Assembly ] होती थी. हिन्दी से हम सबको प्रेम है.. परंतु इस पखवाड़े के दौरान हिन्दी के शिक्षक हिन्दी भाषा की महत्ता बताते- बताते धर्म की ही धज्जियाँ उड़ाने लगते थे और हमारे ईष्ट देवों का, विषय की गंभीरता दर्शाने हेतु उपहास उड़ाते थे.....बच्चों का क्या है, वो क्या अन्य शिक्षक व प्रिंसिपल तक हँसते थे....हमारे प्रिंसिपल को प्रचार्य की जगह यदि प्रधानाचार्य कह दिया जाए तो वे ये भी न देखते थे कि जिसको वो बेहद बुरी तरीके से डपट रहे हैं , वो कोई पशु नहीं अपितु एक अबोध बच्चा है. परंतु हमारे ईश्वर श्री हनुमान जी को जब 'हनु' कह कर हिन्दी भाषा की मह्त्ता समझाने के लिये उदाहरण के तौर पर बोला जाता था तो सबसे ज्यादा क्लोस- अप मुस्कान प्रधानाचार्य .... माफ कीजियेगा ! प्राचार्य जी के मुख पर ही दिखाई पड़ती थी.
बच्चों को धूप में 4-5 घंटो तक तपाना , उनके अनुसार बच्चों का फिज़िकल स्टैमिना बढ़ाना होता था.. और धूप में पकाना [ बातों व भाषण से ] , बच्चों में बकवास सुनने के लिये धैर्य शक्ति जाग्रत करवाना था.
पढ़ाई की बात करें तो , मैंने अपने विद्यालय की किताबों में क्या पढ़ा मुझे उसका आज एक शब्द भी याद नहीं . क्योंकि सिर्फ नंबर पाने के लिये पढ़ाई होती थी .कुछ सीखने या समझने के लिये नहीं .
 मेरे विद्यालय में घटी ऐसी नाजायज़ घटनाओं की मेरे पास कमी नहीं , जो वहाँ आम थीं . पर वो घटनाएं असल में आम थीं नहीं बल्कि बेहद शर्मसार कर देने वाली थीं.पर फिर भी हमें यह शिक्षा दी जाती है कि अपने गुरु का सदैव सम्मान करो ...पर क्या कोई ऐसा है जो गुरु को गुरु होने का अर्थ समझाने की शक्ति रखता हो...क्या कोई उन्हें ये बता सकता है कि सम्मान सदैव दिल से किया जाता है और यदि दिल में ही घृ्णा भरती जाए तो एक दिन वो घृ्णा, वो घुटन,  हूक बनकर  ठीक वैसे ही बाहर आती है जैसे  ज्वालामुखी फटने के बाद लावा विधवंस का रुप लेकर तबाही व विनाश अपने साथ लाता है..... ......

खैर, अभी फिलहाल इन्हीं घटनाओं के साथ इस लेख को विराम दे रहा हूँ. परंतु ये मत समझियेगा कि ये इस लेख का अंत है क्योंकि अंत नहीं अपितु प्रारंभ है ये....   अभी ऐसे बहुत से पन्ने खुलने बाकी हैं जो भविष्य में आपके समक्ष प्रस्तुत  होंगे...तब तक करिये इंतज़ार , बने रहिये आपके अपने ऋषभ के साथ....

नोट :  इस लेख क मूल उद्देश्य केवल बाल कल्याण के लिये  आम जनता को जागरुक करना है ताकि गुरु शिष्य-परंपरा का मज़ाक ना बन सके और भविष्य में  ऐसे शिक्षकों पर सख्त कारवाई हो जो बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़  कर रहे हैं.....

[ लेखक एक प्रख्यात समाज सेवी संस्थान [ NGO] से जुड़ा है व बाल शोषण के खिलाफ एवं बाल विकास व कल्याण के लिये राष्ट्रीय स्तर पर प्रयासरत हैं.]


आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :                      
                                                                        - ऋषभ शुक्ल










copyright©2012Rishabh Shukla.All rights reserved

3 comments:

  1. awesome opinions.... revolutionary thoughts ..keep it up dear

    ReplyDelete
  2. Excellent! Thank you so much for saying what needs to be said
    - X KVian

    ReplyDelete
  3. thank you! you answered questions I didn't even know that I had.

    ReplyDelete