Saturday, 18 May 2013

ज़मीन, ज़ुबान, तमीज़ व तहज़ीब ............



ज़मीन, ज़ुबान, तमीज़ व तहज़ीब ............


'ज़मीन, ज़ुबान, तमीज़ व तहज़ीब' - कहने को ये मात्र चार शब्द हैं पर इनका अर्थ अत्यंत गहरा व गंभीर है. ज़मीन अर्थात धरती , जिस पर हम जन्म लेते हैं , चलते हैं, किसी भी वस्तु का आधार ही ज़मीन है. ज़ुबान अर्थात हमारी बोली ...हम जो सोचते हैं ...जो दिल व दिमाग में विचार होते हैं...उन्हें अपनी बोली भाषा , ज़ुबान द्वारा प्रकट करते हैं . तमीज़ व तहज़ीब का दायरा हमारे संस्कार , शिष्टाचार , शिक्षा आदि के इर्द- गिर्द होता है.
यदि इन चार शब्दों की और विवेचना की जाए तो ये चार शब्द ( ज़मीन, ज़ुबान, तमीज़ व तहज़ीब ) हर किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की बुनियाद होते हैं... पहचान होते हैं. ये चार शब्द हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं. हम क्या हैं, कौन हैं, क्यों हैं आदि प्रश्न खुद को ज़मीन से जोड़े रखने के लिये निहायत जरुरी है....हमारे इतिहास को दर्शाते हैं.... हमारे संस्कृ्ति व संस्कारों को दर्शाते हैं.


आज के परिवेश में हर कोई खुद को ज़मीन से जुड़ा हुआ कहना पसंद करता है. कोई भी यह नहीं चाहता कि कोई उसे ' बदतमीज' शब्द से नवाज़े . हर कोई खुद को तहज़ीब पसंद लोगों के इर्द-गिर्द ही देखना व उनके साथ रहना पसंद करता है. परंतु वास्तविकता में एक व्यक्ति के भीतर इन चार शब्दों का कितना समावेश है या बिल्कुल नहीं, यह कोई अपने लिये समझना नहीं चाहता पर दूसरों को तमीज़ व तहज़ीब व उसकी ज़ुबान के बारे में भाषण देने में तनिक भी गुरेज़ नहीं करता .
पारिवारिक संस्कारों , हमारी परवरिश के अलावा कक्षा प्रथम से ही हम सभी को शिष्टाचार ( तमीज़ व तहज़ीब ) की बातें सिखायी जाती हैं ...इसके बावजूद व्यक्ति की उम्र के साथ उसके दिमाग से इन चार शब्दों का वजूद नष्ट होने लगता है. हमारे आधुनिक समाज का कटु सत्य है कि आज इन चार शब्दों को तवज्जो देने वालों की संख्या बेहद अल्प है. मैं यदि अपने निजि अनुभवों की ही बात करुँ तो अपनी ज़िंदगी के 22 वर्षों में मेरा सामना अधिकतर उन लोगों से हुआ है जो हर वक़्त अपने चेहरे पर मुखौटा पहने रहते हैं.... ' मुखौटा ' - जो उनके भयानक चेहरे व शख्सियत को छुपाने की की क्षमता तो नही रखता किंतु कुछ देर के लिये ही सही उनकी असलियत पर आवरण जरुर डाल देता है. ...... ऐसे लोग खुद को समाज के ठेकेदार मानते हैं ..बात - बात में उनके मुख से यही शब्द निकलते हैं कि समाजिकता का ख्याल रखें ....समाज...समाज...समाज......बस समाज.......और खुद समाज नामक शब्द का मंत्रोच्चारण करते-करते कितने गैर -समाजिक कृ्त्यों को अंजाम देते रहते हैं..... जिसके लिये उन्हें खुद से घृ्णा भी नहीं होती. ...बल्कि अपनी घृ्णित हरकतों को छिपाना ......खुद को भला मनुष्य बता कर व दूसरों को मूर्ख बना कर खुद की "Over Smartness" पर इतराते हैं...भले ही सामने वाला व्यक्ति उनके काले - कारनामों से भली- भाँति परिचित ही क्यों न हो.
पर यह भी हमारे आधुनिक समाज का काला सच ही तो है कि ऐसे दूषित विचारों वाले व्यक्ति , तमीज़ व तहज़ीब से कोसो दूर, शिक्षित होने के बावजूद शिक्षा की धज्जियाँ उड़ाने वाले लोगों को हमारा समाज, सिर्फ अपनाता ही नहीं अपितु फूलने-फलने के अवसर भी प्रदान करता है.
यदि सूक्ष्म स्तर की बात करें तो किसी के लिये अपशब्दों का प्रयोग, ईर्ष्या के कारण किसी की बदनामी कराना, द्वेष के कारण शिष्टाचार के सभी दायरों को तोड़ बदमिजाज़ी की सारी हदें पार कर सामने वाले को मजबूर करना कि वो अपने मार्ग से विचलित हो जाए ..... ये सब हमारे समाज के युवाओं के 'Cool Tactics  ' कहे जाते हैं.... और मेरे अनुसार अपने नकारेपन, बददिमागी , लूसरपने , झूठी व सस्ती ईगो की असलियत को सबसे छिपाने के लिये अपनी नपुंसकता का परिचय देने वाली हरकतें....
यह मुद्दा काफी लंबा है तो शायद इसकी कई श्रृंखलाओं से भी आप सभी पाठकों का साक्षात्कार हो .... इससे पहले कि मैं और उदाहरणों को गहराई से प्रस्तुत करुँ, सर्वप्रथम इस लेख को लिखने के पीछे मुख्य कारण क्या है, इस पर प्रकाश डालना चाहूँगा.

' ज़मीन, ज़ुबान, तमीज़ व तहज़ीब ' एक प्रयास है हमारे आधुनिक समाज के उस घिनौने चेहरे से आप सभी को अवगत कराने का जो हमारे समाज को दिनों-दिन खोखला कर रहे हैं... मैं , कोई महान आत्मा नहीं.... महानता नहीं कर रहा है...... पर इतना जरुर कर रहा हूँ कि हमारे समाज में जो भी अच्छाई बची है , जो अच्छे लोग हैं, यदि उनका ऐसे घटिया किस्म के लोगों से सामना हो तो उस पल उन्हें अपनी अच्छाई पर गर्व हो न कि बुरे लोगों की बुराई देख दुख.... बल्कि समाज में विद्यमान ऐसे गंद लोगों की गंदगी द्वारा विचलित होने की जगह अच्छे , भोले, मासूम लोगों को उन पर हँसना चाहिये क्योंकि दूषित विचारों के लोग सिर्फ और सिर्फ मज़ाक व हँसी के ही पात्र हैं और कुछ भी नहीं.

चलिये लेख की गति को बढ़ाते हैं....... अपने निजि अनुभवों की कुछ यादों को उदाहरण स्वरुप प्रस्तुत कर रहा हूँ.....  हम सभी इस बात से भली-भाँति अवगत हैं कि किसी से उसकी उम्र , शिक्षा,सैलरी { तनख्वाह } व पद नहीं पूछना चाहिये...... और किसी छोटे को तो अपने से बड़ों से इस तरह के प्रश्नों  की झड़ी लगाने से पहले अपने संस्कारों को पुन: दोहराना चाहिये. परंतु आज के परिवेश में युवा बहुत कूल हैं.......... इतने कूल कि उन्हें अपने से बड़ों का कोई लिहाज नहीं { बड़ें  ज्यादा खुश न हों , अभी उनकी बेहूदगियों की लिस्ट भी मेरे पास है }.





' ................' - यह एक नाम है जिसको प्रकाशित नहीं करुँगा . यह मुझसे उम्र में 4 वर्ष छोटा है. खुद को बहुत मेहनती, सहनशील मानता है. और दुनिया भर का बोझ .....ध्यान दीजियेगा सिर्फ पारिवारिक नहीं अपितु दुनिया भर का बोझ उस मासूम के छोटे- छोटे कंधों पर है......ऐसा उसका मानना व कहना है . मैं उसके परिवार को काफी समय से जानता हूँ ..... सीधे लोग हैं और थोड़ा संघर्ष भरा जीवन भी है. अत: एक बार उसके पिताजी ने मुझसे कहा कि बेटा ! ऋषभ !! मेरा पुत्र काफी परेशान रहता है ...... तुम उससे बात करो. पता नहीं क्या चीज़ उसको काटे जा रही है . दिनों - दिन उसका आत्मविश्वास टूटता जा रहा है . बेटा ! तुमसे मैं उम्मीद कर सकता हूँ ...तुम कृ्पा कर उससे बात करना , अंकल की बात का मान रखते हुए मैंने अपने busy schedule से थोड़ा समय मिकाल कर उस गधे से बात की और उसकी ढेंचू - ढेंचू सुन मेरे कान पक गए.

" भइया ! मुझसे कोई बात नहीं करता  . सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं. मुझमें Leadership Quality नहीं है ... मैं ठीक से बोल नहीं पाता ...कोई मुझे पसंद नहीं करता ...मेरी गर्ल फ्रेंड नहीं है आदि आदि  "

मैंने उसे सांत्वना दी कि अभी तुम पढ़ाई पर दिमाग लगाओ.... थोड़ा Meditation, yoga किया करो या gym join कर लो ...खाली समय में soft music सुना करो . कोई Instrument या dance classes join कर लो , कॉलेज की हर co-curricular activities में भाग लो . धीरे- धीरे तुम्हें अपने में आत्मविश्वास की अनूभूति होगी और लोग भी तुम्हें पसंद करेंगे.

इसके एक हफ्ते बाद उन महाशय की काया बदल गई...... मैं खुश था कि चलो भगवान चित्रगुप्त ने मेरे जीवन के बही - खाते में एक अच्छा कार्य दर्ज कर लिया होगा और मेरे लिए मृ्त्युपरांत स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त हो रहा है. पर ये क्या एक दिन वही गधा '...............' मेरे पास आया.
मैं उस वक़्त एक सिर दर्द Project  पर काम कर रहा था. वह मेरे कमरे में आया और थोड़ी देर हाल- चाल पूछने के बाद कहता है ....  भइया ! क्या मैं आप के लैपटॉप में एक ' सी ' ग्रेड मूवी देख लूँ? मैं कुछ काम कर रहा था  ...मैंने उससे पूछा क्या सी ग्रेड ? ...जनाब कहते हैं अरे ! अब ऐसा तो होगा नहीं कि आपको सी ग्रेड मूवी का मतलब नहीं पता ...... सी ग्रेड मूवी मतलब 'ब्लू फिल्म' ....... मैं स्तब्ध रह गया ...मैंने उससे कहा कि शायद तुम भूल रहे हो कि मैं उम्र में तुमसे कितना बड़ा हूँ ... अपनी हद में रहो...मेरे सख़्त रवैये को देख् वो थोड़ा हड़बड़ा गया और सॉरी भइया कह कर चला गया...

करीब एक महीने के बाद उस गधे के तो रंग ही बदल गए...एक दिन बातों- बातों में मुझसे पूछने लगा कि आप इंटीरियर डिज़ाइनर हैं ? क्या आपको पता है कि इंटीरियर डिज़ाइनिंग का इतिहास क्या है ...इसकी शुरुआत कब से हुई ...सबसे पहला इंटीरियर डिज़ाइनर कौन था ........आप कितने बड़े इंटीरियर डिज़ाइनर हैं ..क्या आपको देख कर कोई हाथ जोड़ता है.... आपको देख कोई नमस्कार करता है ...आप कितना कमा लेते हैं ..क्या गारंटी है कि आप प्रोजेक्ट्स हैंडल करते भी हैं कि क्या पता आप के पास पैसा कहाँ से आता है?????
उसकी ये बकवास सुन सीधे मन किया कि एक तमाचा घसीट कर उसके मुँह पर  मारुँ पर उसके माँ- बाप के सम्मान के कारण मैंने ऐसा किया नहीं ..... अपने क्रोध पर नियंत्रण रखते हुए उस गधे से मैंने बस इतना ही कहा कि अभी तुम मेडिकल की तैयारी कर रहे हो ....डॉक्टर बन नहीं गए ... तो जरा अपने को और अपने प्रश्नों व जिज्ञासाओं को अपने भविष्य के लिए व खुद के आंकलन के लिए बचा कर रखो...वरना सब्जी का ठेला लगाने के लायक भी नहीं रहोगे.
रही बात मेरी मैं तुम्हारे हर प्रश्न का जवाब देता हूँ इसलिए नहीं कि तुम्हारी इतनी हैसियत है कि मैं तुम्हारे प्रश्नों का जवाब दूँ अपितु इसलिए ताकि तुम्हें समझ में आए कि मैं आज कहाँ स्टैंड कर रहा हूँ ...
उसके बाद मैंने उस गधे को इंटीरियर डिज़ाइनिंग की History ,Civics, Geography, Chemistry , physics , biology etc.   सब बता डाली ...यह सब सुनने के बाद वो गधे महाशय कहते हैं कि बाप रे भइया ! एक बात तो तय है कि आपको Knowledge  बहुत है....... मैंने गधे महाशय से कहा कि अब तुम भी कोशिश करना कि तुम्हें भी तुम्हारे कार्य क्षेत्र के बारे में इतनी ही Knowledge हो .....क्योंकि 4- 5 वर्षों के बाद यदि मिले तो तुमसे जरुर पूछूँगा कि कितने बड़े डॉक्टर बन गए हो तुम.

आज 5 वर्षों से अधिक समय हो गया है उस गधे ने मेडिकल की तैयारी करते - करते अपने माँ- बाप का रुपया पैसा जमा पूँजी सब व्यर्थ कर दी और अंतत: आज परचून की दुकान में अपनी सक्रिय भागीदारी दे रहा है और अपने नकारेपन व लूसरपने को मानने के बजाए  अपने की पारिवारिक सद्स्यों को व अपनी आर्थिक स्थिति को अपनी दुर्दशा का ज़िम्मेदार बताता फिरता है ...... बेशर्मों की तरह .
ऐसे बेशर्मों की बेशर्मी वाकई काबिले- तारीफ है.................
एक अन्य वाक्या बताता हूँ................ काफी समय पूर्व जब मैंने डिज़ाइन कॉलेज में दाखिला लिया तो पता नहीं कहाँ से इस बारे में मेरे कुछ रिश्तेदारों को भनक लग गई ... अब रिश्तेदार तो रिश्तेदार होते हैं तो रिश्तेदारी के नाम पर उन्हें लाइसेंस प्राप्त होता है बक ‍$#@! करने का ......
तो बस आए एक जनाब एक दिन मेरा इंटरव्यू लेने .....जैसे ही मैंने उनसे नमस्ते किया , वैसे ही उन्होंने ने मेरे नमस्ते का जवाब न देते हुए मुझसे कहा ..सुना है तुम दिल्ली जा रहे हो ? क्यों जा रहे हो ? तुम्हें तो अभी से देख कर लग रहा है कि तुम बाहर जाकर अपनी तमीज भूल जाओगे.......

मैंने पूछा क्यों जी ! आपको अभी से ऐसी भविष्यवाणी कैसे हुई ....वे बोले तुमने मेरे पैर नहीं छुए इसलिए .... मैंने उनसे कहा .. देखिये आज मेरे दिल्ली जाने की खुशखबरी में आप इतना खुश हो गए कि शायद आप मेरा और आपका रिश्ता भी भूल गए हैं ,,,,पिछले 17 वर्षों से में आपसे नमस्ते ही करता था तब आपको कोई परहेज नहीं था लेकिन ये दिल्ली जब से बीच में आई ....जिसके कारण मैं तो नहीं.... पर आप ये भी भूल गए कि आप रिश्ते में हमारे 'मामा जी' हैं और हमारे ब्राह्मण समाज में मामा के पैर नहीं छुए जाते हैं वरना उन्हें नर्क की प्राप्ति होती है - ऐसा कभी आपने ही कहा था .....पर नहीं ..... अब आपको पैर ही छुआने हैं क्योंकि दिल्ली जाकर मैं अपनी तमीज़ भूल गया हूँ.... लेकिन आपकी इस तरीफे काबिल बातचीत ने साफ कर दिया कि अब से मुझे आपसे नमस्ते भी नहीं करना चाहिये क्योंकि जिस अंदाज़ में आपने मुझसे बात की है वो किसी बालक की अबोध मानसिकता को हिला देने में और उसको उसके मार्ग से विचलित कर देने के लिए पर्याप्त है.

फिर सुनिये क्या बोले मेर so- called मामा जी ......  तो क्या तुम रितु बेरी, रोहित बल , मनीष मलहोत्रा बन जाओगे डिज़ाइनिंग की पढ़ाई करने के बाद .... डिज़ाइनिंग इतना जटिल विषय है और फिर कितनी प्रतिस्पर्धा है पता नहीं है तुम्हें ..... वगैरह वगैरह ..उन्होंने उनके खुद के बच्चों को भी शायद इतनी   Career Counselling नहीं दी होगी ..
मैंने हँसते हुए कह दिया कि अरे ! मेरे इतने ऊँचे ख्वाब नहीं .....बस अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँ ......बस इतनी ही तमन्ना है बाकी अब आप इतना कह रहे हैं तो मैं भी बता दूँ कि ईश्वर की कृ्पा हुई तो सीधे Donatella Versace  और  Coco  Chanel के ही Male Version बन जाएंगे .......

फिर सुनिये उनकी बकवास  ...... मेरे पिताजी की तरफ देखते हुए कहते हैं कि देख रहे हैं आप ! इन महाशय के अमरीका जाने के ख्वाब हैं ....
इससे पहले कि वो और कुछ बोलते { भौंकते } , मैंने कहा....... अरे नही ! अमरीका तो आप अपने बच्चों को भेजियेगा ...हमें तो भारत से ही प्रेम है और डिज़ाइनिंग की पढ़ाई करके वापस उत्तर प्रदेश में ही उद्योग स्थापित करने का जिगरा और हौसला है .
मेरी इस बात पे उनका Frustration बढ़ गया और कहते हैं अरे! तुम तो ऐसे बात कर रहे हो जैसे जाने कौन से किले गाढ़ { किले बनवाना } दोगे..............
मैंने उनसे कहा कि ऐसा है कि मैं तो कुछ बात कर नहीं रहा हूँ ...बात तो उतनी देर से आप ही कर रहे हैं ...मैं चाहे जितनी भी कोशिश करुँ कि आपकी बातों को Positively  लूँ पर आप मुझे मजबूर कर रहे हैं ये कहने के लिए कि अब मैं कौन से किले गाढ़ता { किले बनवाता } हूँ ...ये तो वक़्त ही बताएगा ..फिलहाल आगे से आप मम्मी - पापा के Reference से आइए , आपका स्वागत है ...मेरा आपसे कुछ लेना देना नहीं और अब से मुझसे किसी भी प्रकार की उम्मीद मत रखियेगा ...... नमस्ते तक की उम्मीद न रखें , वही बेहतर है हम दोनों के लिए . इतना कह कर मैं हट गया वो बराबर बकर - बकर करता रहा और जैसी कि मुझे उम्मीद थी कि मम्मी- पापा मुझे डाँटने लगे .... मैंने भी कह दिया कि वो इतनी बकवास कर रहे हैं आप उन्हें चुप नहीं करा रहे हैं और मुझे चुप कर रहे हैं ...उनकी जलन की दुर्गंध मुझसे सहन नहीं हुई और हर एक चीज़ की एक सीमा होती है ... ऐसे रिश्तेदारों से तो अकेला रहना ही भला ... आप लोग रिश्तेदारी निभाओ पर मुझसे अपेक्षा न रखो .......


एक मेरे करीबी ने एक दिन मुझसे कहा था कि यही समाजिकता है .... सबसे अगर तुम ऐसे ही नाराज़ हो जाओगे तो कैसे काम चलेगा ....थोड़ा Compromise   व लचीला रवैया तो अपनाना ही पड़ता है ...सुख - दुख में यही लोग काम आते हैं...... उनकी इस बात पर मेरा तर्क था कि सुख के दिनों में तो इस तरह का नकारात्मक रवैया सामने आया है...... जो सुख के क्षणों को दुख में बदल दे तो दुख के समय में क्या होगा ?????
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मैंने यह भी कहा कि  मैं अपनी बात कर रहा हूँ ...ये मेरे उसूल हैं ... अगर इसी रवैये के साथ मैं सदैव अकेला भी रहा तो मुझे गर्व होगा पर सब कुछ समझते हुए भी दूसरों की बकवास या जलन के कारण खुद को क्षति पहुँचाना - कहाँ की समझदारी और तब जब आप कोई गलत काम न कर रहे हों. ज्यादा से ज्यादा लोग यही कहेंगे कि जब मैं मरुँगा तो कोई कंधा देने नहीं आएगा तो उसका भी मैंने इंतेज़ाम सोच लिया है कि मैं मरने से पहले अपने शरीर का दान { देह - दान } कर दूँगा ..... और बोलो ..... अब क्या कहेंगे आप ............... ऐसा करने से मरोणोपरांत जो पूजा और हवन में खर्च आता है उसका भी कष्ट किसी को नहीं होगा और अर्थी को कंधा देने के लिए भी चार लोगों की भी जरुरत नहीं पड़ेगी .
मेरे इस कथन को सुन वो व्यक्ति स्तब्ध रह गया और नि: शब्द रह गया ........ पर मैं क्या करुँ मैं ऐसा ही हूँ......... और अपनी इन्हीं खूबियों के कारण मैं खुद पे मरता हूँ .......   वो कहते हैं ना कि मैं अपना Favourite हूँ  {  JAB WE MET  में करीना कपूर का Dialogue था और अच्छे Dialogues की cheating करने में किसी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिये ......  हा हा हा हा........... }


खैर , ईश्वर की कृ्पा से बड़ी ही कम उम्र में मुझे इंटीरियर डिज़ाइन कॉलमिस्ट के तौर पर काम करने का मौका मिला .......लोगों ने हौसला बढ़ाया तो मेरी खुद की बुक 'एक आशियाने की ओर' प्रकाशित हुई जिसका बहुत अच्छा Response   मिला ......  और जैसी की मुझे उम्मीद थी कि मेरे मामा जी को भी इसकी भनक लग गई . एक दिन आए घर पर और पूछने लगे रवि बेटा कहाँ है ! रवि बेटे से मिलना है ! { रवि मुझे घर पर लोग प्यार से बुलाते हैं } ......मेरा मन तो नहीं था उनका मुँह देखने का फिर वर्षों पहले की बात याद आ गई जब उन्होंने मुझसे कहा था कि देखते हैं कौन से किले गाढ़ { किले बनवा } लेते हो ..... और बस मेरे मन मस्तिष्क में खुराफात जाग उठी ...... और मैंने सोचा कि चलो मामा जी से मिल ही लेते हैं..... 




 मामा जी की तरफ मैंने देखा पर नमस्ते नहीं किया ..सीधे उनके बेटे से हाल चाल पूछे...... उनके बेटे मुझसे उम्र में बहुत बड़े हैं. मैंने उन्हें बताया कि भइया आप को पता है कि मेरी खुद की बुक प्रकाशित हुई है ..... बहुत बढ़िया Response भी मिला है ...अपने देखी ??

उन्होंने कहा कि सुना तो था पर देखी नहीं .... मैंने उनसे कहा कि रुकिए अभी मैं आपको अपनी बुक दिखाता हूँ ... बुक को देखते ही भइया काफी तारीफें करने लगे ....बीच - बीच में मैं मामा जी के चेहरे के भावों को Judge कर रहा था फिर मैंने भइया से पूछा कि तो भइया...... अब आप बताइये कि कैसे किले गाढ़े { किले बनवायें } है आपके छोटे भाई ने ????

भइया और मामा जी मुझे देख कर रहे गए .....चूंकि मामा जी ने कुछ समय पूर्व जो मुझसे बकवास की थी उसके साक्षी भइया भी थे .....तो उन्हें भी वो वाक्या बखूबी याद था.

यह कहने के बाद मैंने मुस्कुराते हुए मामा जी की ओर देखा और भइया से पुन:  पूछा , " हाँ भइया तो बताइये कि कैसे किले गाढ़े { किले बनवायें } है आपके छोटे भाई ने ????

अब भइया ने फीकी सी हँसी के साथ अपने पापा { मेरे पूज्यनीय मामा जी } की ओर देखते हुए कहा बहुत मजबूत किले गाढ़े { किले बनवाए } हैं .... अपने बेटे की ये बात सुन मामा जी की निगाहें झुक गईँ... और मैं बदतमीज़ों की तरह अट्ठास करने लगा ..... वैसे मुझे ऐसा नहीं करना चाहिये था पर मेरा आक्रोश ज्वालामुखी के लावे की तरह फूट पड़ा जिस पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं था .
फिर मैंने कहा कि भइया आप तो बचपन से मुझे देख रहे हैं क्या करुँ अब देखिये कुछ लोग मेरे ही घर आएंगे ..... चाय नाश्ता खाएंगे और मुझसे ही बकवास करने लग जाएंगे कि कौन से किले गाढ़ दिए तुमने रवि !!!!!!! आप बताइये ऐसे लोगों को आप क्या कहेंगे और ऐसे लोगों के साथ आपको क्या करना चाहिये ...

भइया ने अपने पिताजी { मेरे पूज्यनीय मामा जी } की तरफ थोड़ी नफरत से देखा और कहा कि अरे बेटा ! लोगों की जलन और ईर्ष्या की कोई सीमा नहीं होती ...तुमने ये बुक मुझे दिखायी क्योंकि तुम मेरा सम्मान करते हो ....तुम्हें तहज़ीब है और मैं भी अपने छोटे भाई की सफलता से खुश हूँ लेकिन हर किसी को तमीज़ नहीं होती ... दूसरों की सफलता देखकर लोग अमूमन जल उठते हैं...लेकिन जिसकी ख्याति फैलनी होती वो फैल ही जाती है जैसे कि तुम ....... 


मैंने भइया से कहा कि बस आपकी यही बात तो मुझे अच्छी लगती है कि आप निष्कपट स्वभाव के हैं.... तभी मैं आपकी इज्जत करता हूँ ..बाकी जिनको ज्यादा गर्मी सवार है या जो ज्यादा ईर्ष्यालु या कुंठित हो रहे हैं और मुझे छोटा समझ के अपना Frustration मुझ पर निकाल रहे हैं तो ऐसे लोगों को मैं जूते मारकर ही भगाता हूँ ... कुछ गलत तो नहीं करता ...क्यों भइया ?????

मजबूरी में ही सही पर भइया ने कहा , " सही बात है रवि बेटा ! और किया भी क्या जा सकता है ... बड़ो को भी सोच - समझ के बात करनी चाहिये ..."

मैंने कहा , " बिल्कुल ठीक !"






मामा जी की निगाहें बराबर झुकी रहीं .. और उनकी झुकी निगाहों को देख मुझे थोड़ा बुरा लगा पर जिस चीज़ की शुरुआत उन्होंने की थी, मैंने सिर्फ उसका अंत किया था .......क्योंकि शायद मेरी जगह कोई और होता तो उस वाक्ये के बाद वो अपना आत्मविश्वास खो बैठता ...पर भइया की बात ने मुझे अहसास दिला दिया कि दुनिया सच में गोल ही है .............
कुछ समय पूर्व जब मैं मामा जी से तमीज़ से पेश आ रहा था तो मुझे बदतमीज़ कहा गया पर आज जब मैंने सच में बदतमीज़ी करी तो मुझे कहा गया कि तुम सम्मान करना जानते हो ......... तुम्हें तहज़ीब है............

शायद यही है जमीन, जुबान , तमीज़ व तहज़ीब का खेल ......लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि हम दूसरों को सम्मान न दें .... अपनी ओर से पहला कदम अच्छा ही बढ़ाइये ....दूसरों से तमीज़ व तहज़ीब से पेश आइये  पर अगर सामने वाले को आपके द्वारा दी गई इज्जत हज़म न हो तो उसे अच्छे से  ' हाजमोला ' अवश्य खिलाइये......... समझदारों को इशारा ही काफी है .


आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका प्यारा और थोड़ा " बदतमीज़ ":

                                                      - ऋषभ शुक्ल



 
 

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Tuesday, 1 January 2013

महाभारत की महानायिका- द्रौपदी.




महाभारत की महानायिका -  द्रौपदी.


'महाभारत' - हमारे प्राचीन इतिहास की महागाथा ....... धर्म की अधर्म पर विजय का साक्षी ..... महाभारत साक्षी है कि जब-जब संसार में अधर्म ने धर्म पर हावी होने का प्रयत्न किया है , तब स्वयं धर्म की रक्षा करने हेतु ईश्वर संसार में अवतरित हुए हैं और धर्म की रक्षा की है . महाभारत की गाथा से सबसे बड़ा संदेश जो मिलता है वो यह है कि स्त्री का अपमान करने की चेष्टा करने वालों का जड़मूल समेत सर्वनाश होता है और इसकी साक्षात संदेशवाहिनी बनीं द्रुपदनंदिनी द्रौपदी .


'द्रौपदी' - प्रतीक है धर्म की, न्याय की..... द्रौपदी वह लौह नारी हैं जिन्होंने द्वापर युग में और आने वाले युगों व पीढ़ियों के लिये यह स्पष्ट संदेश दिया कि नारी का अपमान करने की चेष्टा करने वाले कापुरुषों का जो रक्तरंजित समूल अंत होता है वो सदियों तक रुह में कँपन पैदा करने वाला होता है.
इतिहास साक्षी है कि द्रौपदी ही असल में महाभारत की महानायिका है, महाभारती है , अपराजिता है, लौह नारी है. यज्ञकुण्ड से अवतरित वो देवी स्वरुपा हैं जो अन्याय , अनाचार , अधर्म  व अनैतिकता के विरुद्ध चुनौती बनकर अग्निज्वाला सी दहकती रहीं व विजयी हुईं . बहुत से लोगों ने भरी सभा में अपमान कर उस द्रुपद्सुता को तोड़ने के लिये हर संभव प्रयत्न किये पर द्रौपदी ज्वालामुखी सी अग्निशिखा के समान धधकती हुई, न सिर्फ अपने पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए अपने पाँचों पतियों को दासता से मुक्ति दिलायी बल्कि एक वीरांगना के रुप में शपथ भी ली कि वो अपने अपमान का बदला दुशासन के रक्त से अपने केश धोकर लेगी व भरी सभा में द्रौपदी का अपमान करने वालों को जब तक यमलोक न पहुँचा दिया जाए, तब तक उसकी अंतरात्मा को शाँति नहीं मिलेगी .


द्रौपदी नारी शक्ति की द्योतक हैं . वह युद्ध की देवी हैं , प्रचंड साहसी हैं जिन्होंने अपने जीवन में हर प्रकार के अपमान सहे परंतु वो न झुकीं, न टूटीं बल्कि एक ऐसे महाभारत युद्ध की रचना की जिसके आघोष में सब छितर बितर हो गया. द्रौपदी के तेज व विलक्षण व्यक्तित्व को श्रीकृ्ष्ण ने ही समझा तभी तो धर्म की अधर्म पर विजय का संदेश देने के लिये स्रोत बनीं द्रौपदी .

द्रौपदी  वह स्त्री हैं जिनके जीवन में अनेकों संघर्ष आए. स्वयंवर में पति के रुप में अर्जुन को चुना पर विधि की विडंम्बना तो देखिये कि अर्जुन और कुंती की गलती के कारण द्रौपदी को पाँच पतियों की पत्नी होने की त्रासदी सहनी पड़ी . जिसके कारण द्रौपदी को अनेकों लाँछन सहने पड़े . विचित्र मर्यादाओं व नियम जो उसी के लिये बनाए गए उनका पालन करना पड़ा . द्रौपदी अद्वितीय सौंदर्य , तार्किक शक्ति , बुद्धिमत्ता व विद्या की धनी वीरांगना स्त्री थीं. . उनके विलक्षण व्यक्तित्व के कारण बड़े- बड़े महारथियों ने ईर्ष्या व जलन के कारण उनके खिलाफ अनेकों षड़यंत्र व कुचक्र रचे ताकि द्रौपदी उनके समुख टूट जाए , झुक जाए व अपना मनोबल खो बैठे . परंतु अतुल्य था द्रुपदनंदिनी का आत्मबल . आजीवन संघर्षों के कारण वह भी टूट सकती थी पर जितना कापुरुषों ने उन्हें कुचलने  का प्रयास किया वो उतनी ही धधकती हुई एक क्रुद्ध वीरांगना की तरह हुंकारती हुई हर अत्याचार के खिलाफ पुरजोर विरोध करती रहीं.धर्म की रक्षा के लिये तत्पर रहीं. 


द्र्पदनंदिनी द्रौपदी का अंत तक कोई भी आत्म- सम्मान व मनोबल तोड़ न सका. कोई भी उनके मार्ग को काट नहीं पाया . द्रुपदनंदिनी की आपार शक्ति, बौधिक कौशल , मनोबल व स्वाभिमान का लोहा उनके दुश्मनों ने भी माना. उस युग में द्रौपदी  ही एकमात्र ऐसी स्त्री हैं जो नारी शक्ति की द्योतक हैं . महाभारत काल की ही यदि बात करें तो कितनी ही नारियों पर धर्म के नाम पर अनेकों अत्याचार किये गए. ध्यान देने योग्य बात है , जो हुआ अम्बा के साथ . किस विवशता के कारण  उसने आत्मघात किया . अंधत्व से ब्याह देने पर क्यों गांधारी ने भी सदा के लिये अपनी आँखे बंद कर ली थीं . परंतु द्रौपदी का चरित्र ऐसा है जो ना सिर्फ नारी के भीतर बल्कि पुरुषों में भी वीरता फूँक दें . जिसमें अग्निज्वाला है , प्रतिशोध की भावना है तो करुणा का सागर भी है. श्रीकृ्ष्ण की परम भक्त , उस युग में भक्ति की शक्ति को दर्शाने वाली, स्वर्ण की भाँति वो जितना जली उतनी ही प्रखर व दिव्य होती गई. वो लावण्या थी. अकेलेदम अन्याय के खिलाफ पुरजोर विरोध कर स्वाभिमान के साथ जीवन जीने वाली एक शक्ति व प्रेरणा स्रोत थीं.

द्रौपदी  साक्षी हैं एक ऐसे संपूर्ण व्यक्तित्व की जो अपनी ज़िम्मेदारियों को संपूर्ण ईमानदारी के साथ निभाती हुई जीवन के संघर्षों का ड्ट्कर व पूरे साहस के साथ सामना कर व हर अत्याचार , कर कुचक्र , षड़्यंत्र को अपने मनोबल द्वारा काटती और विरोध करती हुईं दीपशिखा की भाँति प्रज्जवलित होती रहीं व धर्म का प्रतीक बन सही मायनों में बनीं महाभारत की महानायिका व अपराजिता.




This appeared in one of the leading hindi magazines ........

 
 

आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ ,
नव वर्ष के शुभकामनाओं सहित  आपका :


                                                      - ऋषभ शुक्ल



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Tuesday, 4 December 2012

GUEST POST : A part of a Novel written by Miss Swapnil Shukla.

प्रिय ब्लॉग दोस्तों ,
                        नमस्कार !

आज इस  चिट्ठे  के माध्यम से मैं, स्वप्निल जी  द्वारा रचित व लिखित एक उपन्यास का पहला भाग, आप सभी के साथ बाँट रहा हूँ. यह कहानी है ,ज़िंदगी के संघर्ष , घुटन व दर्द की............ ये कहानी है, एक होनहार अभिनेता के अर्श से फर्श तक के सफर की ......जिसका प्रारंभिक भाग आप सभी के समक्ष इस उम्मीद के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि आप सभी की बेबाक टिप्पणियाँ व सलाहों द्वारा स्वप्निल जी, को  इसे और अधिक बेहतर व रोचक बनाने की प्रेरणा मिलेगी.......

ध्यान दीजियेगा कि प्रस्तुत अंश  उपन्यास का केवल प्रारंभिक भाग ही है ...... अभी इसके अन्य भाग लिखने शेष हैं...........इस दिशा में कार्य प्रगति पर है. कोशिश रहेगी कि संपूर्ण उपन्यास शीघ्र ही प्रकाशित होकर विभिन्न पुस्तक भंडारों की शोभा बढा़ये . आप सभी के विचारों , सलाहों व टिप्पणियों का स्वागत है. आपके मार्गदर्शन की आशा के साथ पेश है अर्श से फर्श के सफर का प्रारंभिक भाग :

अर्श से फर्श का सफर :



माया नगरी मुंबई .......सपनों का शहर ........जहाँ हर रोज़ न जाने कितने ही मुसाफिर आते हैं ...... इस शहर में अपनी राह खोजने .............भटकते कदमों की दिशा तलाशने. जिसमे से न जाने कितनों का सपना होता है फिल्म इंड्स्ट्री की चकाचौंध से भरी दुनिया में अपना नाम बनाने का ......... पर् 'अनिरुद्ध खंडेलवाल' को ये सब विरासत में मिला था. अपनी विरासत को आगे बढ़ाते हुए आखिरकार अनिरुद्ध् भी फिल्म इंड्स्ट्री का चमकता सितारा बन गया था. पर देखते ही देखते ये सितारा कहाँ गुम हो गया , इसके बारे में कोई जान न सका. अनिरुद्ध का अर्श से फर्श तक का सफर बेहद दर्दनाक, घुटनपूर्ण , कश्मकश , भ्रम, सच, झूठ , विश्वास, धोखे, बेबसी से भरा हुआ था.

मुंबई के अंधेरी में स्थित बड़े-बड़े बंगलों में से एक बंगला 'अनिरुद्ध' का भी था. अनिरुद्ध ,साइक्लॉजी में स्नातक की डिग्री प्राप्त एक 20 वर्षीय खूबसूरत व बेहद मासूम युवक था. अनिरुद्ध के छोटे भाई 'आकाश'  (18 वर्ष ) की निगाहों में अपने भाई अनिरुद्ध के लिये न कोई इज्ज़त थी न दिल में कोई स्नेह था. अनिरुद्ध के पिता 'तरुण खंडेलवाल' फिल्म इंड्स्ट्री के जाने माने प्रड्यूसर - डायरेक्टर थे जिनके रौब का लोहा पूरी फिल्म इंडस्ट्री मानती थी.

तरुण अपने पुत्र अनिरुद्ध को बेहद नापसंद करते थे और छोटे पुत्र आकाश के प्रति उनका विशेष स्नेह था. अनिरुद्ध को बचपन से ही न माँ का प्रेम मिला ना पिता का . अनिरुद्ध की माँ का देहांत तो उसके छोटे भाई आकाश के जन्म के बाद ही हो गया था.

अनिरुद्ध को अक्सर लगता था कि वो अपने सफल प्रडयूसर पिता की नज़रों में काबिल नहीं है और जिस दिन उसने अपनी काबिलीयत का परचम लहरा दिया , उसी दिन उसे अपने पिता का प्रेम व मान -सम्मान प्राप्त हो जाएगा.

अनिरुद्ध की ज़िंदगी के बीस वर्ष बेहद घुटन भरे थे ..... तरुण से उसे कभी पिता का प्रेम नहीं मिला , मिली तो सिर्फ ज़िल्लत.....न उसका कोई दोस्त था, न साथी, न हमसफर , न सुख-दुख बाँटने वाला कोई शुभचिंतक.  अनिरुद्ध बेहद अकेला था.  एक दिन अनिरुद्ध ने बड़ी हिम्मत कर अपने पिता से उनकी आने वाली फिल्म में एक छोटे से रोल की सिफारिश की , उसे फिल्म इंड्स्ट्री से बेहद लगाव था. पर अनिरुद्ध के फिल्म इंड्स्ट्री में रुचि के बारे में सुनते ही उसके पिता तरुण आग उगलने लगे. उन्होंने अनिरुद्ध का मज़ाक उड़ाया , उससे अपशब्द कहे , उसकी काबिलीयत पर प्रश्नचिन्ह लगाये. और बड़ी ही अभद्रता से कहा कि, " मैं क्या पूरी फिल्म इंड्स्ट्री में तुझे कोई छोटा सा रोल क्या चपरासी का काम भी नहीं देगा....ज़िंदगी भर मेरी गुलामत करनी पड़ेगी... और मुझसे  भीख माँगनी पड़ेगी... अपनी शक्ल देख आईने में... भद्दा, अभद्र , बद्सूरत , मनहूस कहीं का."

अनिरुद्ध के दिल व दिमाग में अपने ही पिता के शब्द ऐसे  जहरीले तीरों की भाँति चुभे कि उसका सारा आत्मविश्वास ही हिल गया. उसका मनोबल इतना टूट गया कि अपने पिता की बात को सच समझ वो चुपचाप वहाँ से चला गया .  अनिरुद्ध को अपने आप से घुटन हो रही थी . अपनी ही शक्ल से उसे घृ्णा हो रही थी. अपने कमरे में उसे बार बार अपने पिता की वो कड़्वी बातें दिमाग में चुभ रहीं थीं...... उसे इतना दवाब मह्सूस हो रहा था मानो कमरे की सारी दिवारें उसके करीब आ रही हैं ......अनिरुद्ध की मानसिक स्थिति खराब होती जा रही थी . इतने बड़े बंगले में अनिरुद्ध के लिये ऐसा कोई कोना ना था जहाँ उसे पल भर की शांति मिले. अनिरुद्ध खुद को इतन विवश महसूस कर रहा था कि स्वयं को छति पहुँचाने, मर जाने की उसकी इच्छा प्रबल होती जा रही थी ...पर उसे पता था कि ये गलत होगा ..... इसलिये वो अपने बंगले से बाहर समुद्र के किनारे एकांत में चला गया.

रात का समय था ....वहाँ अनिरुद्ध ने कुछ दूर पर एक शख्स को देखा . वह युवक अनिरुद्ध की ही उम्र का था. बेहद आकर्षक व्यक्तित्ब , घुंघराले बाल, कटीली आँखे, नील वर्ण . मानो सम्मोहन शक्ति से लैस बेहद उमदा व्यक्तित्व का स्वामी था वह युवक. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह कुछ ढूंढ़ रहा हो. अनिरुद्ध उसकी मदद करने हेतु उसके पास पहुँचा . अनिरुद्ध के पूछने पर कि क्या वो उसकी मदद कर सकता है .....इस पर युवक ने उत्तर दिया कि, "भाई! जो मैं ढूंढ़ रहा हूँ , वो मैं ही ढूंढ सकता हूँ....."     अनिरुद्ध ने युवक से पूछा आप ऐसा क्या ढूँढ़ रहे हैं ?....... युवक ने उतर दिया कि ," खुद को.."
अनिरुद्ध एक मिनट स्तब्ध रह गया ....... युवक ने तभी जोर से ठहाका लगाया और कहा," अरे जनाब ! खुद का मतलब हीरा....  मैं जौहरी हूँ और मेरा नाम हीरा है ...  और देखिये जरा मेरे पास हीरों की एक पोटली थी और जाने कहाँ मुझसे गुम हो गई .... मुझे लगता है वो यही कहीं गिरी है मुझसे ...बस वही ढूँढ़ रहा हूँ."

अनिरुद्ध हँसने लगा और कहा ," यहाँ !! अगर आपकी पोटली गिरी भी होगी तो हीरे जैसी चीज़ कोई छोड़ेगा भला. ..कोई ले गया होगा ..... या समुद्र की लहरों के साथ बह गए होंगे आपके हीरे..."
युवक ने कहा कि ," लो मेरा तो लाखों का नुकसान हो गया ....लेकिन चलो कहा जाता है कि इस अनंत समुद्र के भीतर खूब खजाना है...उस खजाने की बढोत्तरी में मेरा भी contribution हो गया."

अनिरुद्ध ने मन में सोचा कि कैसा अजीब आदमी है ...इतने नुकसान पर भी हँस रह है .......पागल ही लगता है . तभी युवक ने कहा, "आप सोच रहे होंगे कि मैं पागल हूँ पर यही ज़िंदगी है.  देखिये आज ही पिताजी ने ये ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर डाली थी........लेकिन मैं उसमे असफल रहा ...... अब असफल तो रहा और गलती भी मेरी है ....... जिसकी भरपाई मैं तब तक नहीं कर सकता जब तक ये गलती सुधर न जाए .....फिलहाल इस गलती के सुधरने के आसार तो लगते नहीं , तो क्या करुँ आगे बढूँ या यहीं थम जाऊँ ......मैं तो आगे बढ़ने में विश्वास रखता हूँ ........गलती फिर ना हो जाए या नुकसान न हो इस डर से जीना तो नहीं छोड़ सकता ना........ आपकी क्या राय है .......वैसे आप ने अपना नाम नहीं बताया ." युवक ने पूछा.

अनिरुद्ध ने उत्तर दिया ...... उस युवक से घंटों अनिरुद्ध बात करता रहा.  युवक की आशावादी बातों को सुन  अनिरुद्ध का मन हल्का हुआ और उसका खोया आत्मविश्वास वापस आ गया था.  अनिरुद्ध ने फैसला लिया कि वो स्वयं को एक मौका जरुर देगा. और स्व्यं अपने बल पर अपने पिता की पहचान गोपनीय रखते हुए फिल्म इंड्स्ट्री में अपना नाम बनाएगा. अगले ही दिन से अनिरुद्ध फिल्मों के लिये आडिशन्स देने लगा..... कई आडिशन्स देने के बाद आखिरकार अनिरुद्ध को एक बड़े बैनर की फिल्म मिल गई.  कहते हैं न कि व्यक्ति में काबिलीयत और हौसला हो तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता. अनिरुद्ध के साथ भी ऐसा ही हुआ . फिल्म बन के तैयार हुई . इत्तेफाक से रिलीस डेट वही रखी गई जिस दिन उसके पिता की फिल्म रिलीस होनी थी. अनिरुद्ध की फिल्म ने box office पर कमाल किया. जनता को एक नया हीरो मिला और अनिरुद्ध रातों रात सुपर स्टार बन गया ......एक दम सपने जैसा लग रहा था सब कुछ . इसके उलट तरुण ,अनिरुद्ध के पिता जिनके लिये उनकी फिल्म उनका ड्रीम प्रॉजेक्ट थी बुरी तरह विफल रही ,जिससे वो दिवालिया होने की कगार में आ गए . पिता का सफर अब अर्श से फर्श पर आ पहुँचा तो बेटा अब किसी का मोहताज नहीं रह गया . स्थिति बदल चुकी थी ....... सब कुछ देखते- देखते ही बदल गया था .

अनिरुद्ध  तेजी से अन्य फिल्मों में अभिनय कर अपनी सफलता का परचम लहरा रहा था तो वहीं उसके पिता अपने ही बड़े पुत्र के मोहताज होने लगे थे जो उन्हें कतई गवारा न था . पर अनिरुद्ध को उसके हिस्से की इज्जत, मान सम्मान देना अब उनकी मजबूरी बन गई थी. आखिरकार तरुण ने एक दिन अनिरुद्ध को गले लगा ही लिया और अपनी गलती की माफी माँगी.

अनिरुद्ध की ज़िंदगी हर दिन खुशियाँ लेकर आ रही थी. पर वो अपनी ज़मीनी हक्कीकत को कभी नहीं भूला......सफलता के सातवें आसमां पर पहुँचने के बाद भी वो जमीं पर चलना नहीं भूला.

वक्त बीतता गया. अनिरुद्ध ने अपने पिता के लिये भी कई फिल्में करीं...... अब तरुण की स्थिति भी कुछ हद तक सुधरने लगी थी. पर ये भी सच था कि अनिरुद्ध के बिना तरुण खंडेलवाल कुछ भी नहीं थे. अनिरुद्ध का छोटा भाई आकाश भी अब फिल्म इंड्स्ट्री में आ चुका था. पर अनिरुद्ध की चमक के आगे सब फीके ही थे . तरुण खंडेलवाल अनिरुद्ध पर अपना दबाव बनाना चाहता था. पर अपने ही पुत्र से उसकी ईर्ष्या का स्तर इतना अधिक था कि वो उससे हर हाल में छुट्कारा भी पाना चाहता था. तरुण खंडेलवाल को अनिरुद्ध की सफलता में अपनी हर पल हार नज़र आती थी. वो पूर्णयता एक विकृ्त मानसिकता का व्यक्ति बन गया था.

अपनी विकृ्त मानसिकता के चलते उसने अनिरुद्ध की शादी करने का फैसला किया. वो भी शादी उस लड़की से जिससे खुद तरुण के नाजायज़ संबंध थे. ताकि उसकी मदद से वो अनिरुद्ध की ज़िंदगी बरबाद कर सके. अनिरुद्ध इन बातों से अन्जान था. अपने पिता की इच्छा का मान रखते हुए अनिरुद्ध ने शादी के लिये हाँ कर दी. पर उसी वक्त से अनिरुद्ध की ज़िंदगी में बेहद आश्चर्यजनक बदलाव शुरु हो गए.

एक रात अनिरुद्ध को अपने कमरे में  कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई दीं. बेहद अजीब सी आवाज़ें थी. अनिरुद्ध ने उठ कर इधर -उधर देखा .........पर वहाँ कोई ना था. आवाज़ों की ध्वनि बढ़ती जा रही थी ....... न वो आवाज़ें जानवर की थीं ....... ना ही किसी इंसान की ........बस दिमाग थकाने वाली आवाज़ें थीं. किसी तरह वो रात कटी. अगले दिन आउट्डोर शूटिंग के दौरान भी अनिरुद्ध को पुन: वो आवाज़ें सुनाई दे रही थीं ......जैसे उसके दिमाग में वो आवाज़ें बस सी गई हों. ये बेहद विचलित कर देने वाला अहसास था . अनिरुद्ध समझ नहीं पा रहा था कि ये सब उसके साथ क्या हो रहा है. अनिरुद्ध अपना पूरा दिमाग अपने काम पर लगाना चाहता था . एक दिन अनिरुद्ध अपनी एक फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में अपने फैन्स से मुखातिब हो रहा था. तभी भीड़ में उसे एक शख्स दिखा. वो बड़ा ही अजीब सा दिख रहा था......कुछ अलग सा.... अनिरुद्ध का ध्यान जैसे ही उस पर गया वह झट से अनिरुद्ध के पास आ गया मानो कोई हवा हो .....जहाँ अनिरुद्ध के फैन्स अनिरुद्ध के साथ एक फोटो व उसे छूने के लिये बेकरार थे वहीं वह शख्स अनिरुद्ध को देख बड़े ही रहस्यमयी तरीके से हँसने लगा .....जैसे वो उसका मज़ाक उड़ा रहा हो .......अनिरुद्ध उस शख्स को ध्यान से देख रहा था, देखते ही देखते उस शख्स की हँसी गायब होती चली गई और चेहरा बेहद विकृ्त होता चला गया.... और वो जोर -जोर से चीखने लगा,"भाग जाओ , भाग जाओ ".  अनिरुद्ध उसका ये भयानक रुप देख घबराकर वहां से भाग पड़ा. अनिरुद्ध के फैन्स व वहाँ उपस्थित अन्य लोग अनिरुद्ध का ऐसा रवैया देख अचंभित रह गए. अनिरुद्ध घबराकर अपने घर लौट आया. अगले दिन जब अनिरुद्ध शूटिंग पर पहुँचा तो वहाँ लोगों ने उससे इस विषय में पूछा कि कल अनिरुद्ध वहाँ से अचानक क्यों भागा था? जब अनिरुद्ध ने लोगों से उस शख्स की चर्चा करी तब सभी अनिरुद्ध को बड़े ही आश्चर्य से देखने लगे. अनिरुद्ध के पूछने पर कि आप सब मुझे ऐसे क्यों देख रहे हैं ? तब अनिरुद्ध के एक करीबी ने साफ तौर पर बताया कि जनाब ! वहाँ पर तो ऐसा कोई शख्स था ही नहीं, जिसकी आप चर्चा कर रहे हैं.
यह सब सुन अनिरुद्ध अचंभित था . पहले तो उसे उन लोगों की बातों पर यकीन नहीं हुआ. पर बाद में एक न्यूज़ चैनल पर उसने इस वाक्ये के फुटेज देखे तब अनिरुद्ध को समझ आया कि ये सब तो असल में उसकी ही आँखों का धोखा था. दिनों दिन अनिरुद्ध की मानसिक स्थिति बिगड़ती जा रही थी. रातों को नींद नहीं आती और दिन में वो आवाज़ें  अनिरुद्ध का पीछा नहीं छोड़तीं . चूंकि अनिरुद्ध खुद psychology में स्नातक था, इसलिये उसे यह समझने में देर नहीं लगी कि उसकी दिमागी हालत सही नहीं . असल में अनिरुद्ध को Schizophrenia था .

पर ज़िंदगी के उस मकाम पर जहाँ उसने वो सब कुछ पा लिया था जिसका अनिरुद्ध ने सपना देखा था ,फिर इस बिमारी की वजह क्या थी ....यह अनिरुद्ध के समझ  के परे था.  और Schizophrenia जैसी बिमारी उसके कैरियर को , उसकी ज़िंदगी को अंधकार की ओर ले जाएगी , यह भी लगभग तय था. और अपने इसी भय के कारण अनिरुद्ध ने इस बात का जिक्र सबसे पहले अपने पिता से किया क्योंकि अनिरुद्ध को अपने पिता पर पूर्ण विश्वास था.

जैसे ही तरुण को इस बात क पता चला , उसने अनिरुद्ध को मुंबई से दूर नैनिताल में अपने करीबी दोस्त जो कि एक साइकोलॉजिस्ट थे , 'डॉ . श्याम सक्सेना' के पास इलाज के लिये भेज दिया. नैनिताल में अनिरुद्ध की बिमारी की बात छिपाते हुए तरुण ने चट मंगनी पट ब्याह करवा दिया. अनिरुद्ध उस वक्त इतना परेशान था कि जैसा तरुण उससे कहता गया , वैसा अनिरुद्ध करता गया .पर अनिरुद्ध की हालत नैनिताल में भी बिगड़ती जा रही थी. उसका इलाज पूर्णतया गुप्त तरीकों द्वारा किया जा रहा था, जिसका जिम्मा तरुण और अनिरुद्ध की पत्नी व तरुण की mistress 'पल्लवी' ने उठा रखा था. धीरे - धीरे अनिरुद्ध की हालत गंभीर होती चली गई. यहाँ तक की अब उसे shock treatments भी दिये जाने लगे. अनिरुद्ध की स्थिति बद से बदतर होती जा रही थी.

करीब एक साल् बीत चुका था. अनिरुद् अपना यौवन , खूबसूरती व चमक सब खो चुका था. अब अनिरुद्ध की स्थिति काफी दयनीय थी. वह अपना सब कुछ खो चुका था. अनिरुद्ध की पत्नी पल्लवी ने पहले ही उसे पागल करार कर उससे तलाक ले लिया था. पल्लवी ने अनिरुद्ध पर धोखे से शादी करने व अन्य कई केस लगाकर बदले में क्षतिपूर्ति के लिये करोड़ों रुपये ऎंठे. उधर मुंबई में एक साल् तक अनिरुद्ध की बिमारी को पागलपन बता कर मीडिया ब्रेकिंग न्यूज़ के नाम पर अनिरुद्ध का तमाशा बनाती रही. बड़े - बडे लेखकों ने अनिरुद्ध के अर्श से फर्श तक के इस सफर पर ढेरों किताबें लिख डालीं. अनिरुद्ध के दर्दनाक जीवन पर फिल्में बनीं और जिसका सीधा फायदा हुआ तरुण खंडेलवाल को .....क्योंकि अनिरुद्ध की दिमागी हालत खराब होने की खबर को आम जनता के सामने परोसा भी तो उसी ने था. उसने अपने ही बेटे की तकलीफ का तमाशा बनाकर खूब रुपया कमाया. असल में ये सब तरुण की ही सोची समझी रणनीति थी जिसकी नींव उसी दिन से रख दी गई थी जब अनिरुद्ध ने अपनी बिमारी क जिक्र अपने ही पिता तरुण से किया था. तरुण ने तभी ये षड्यंत्र रच डाला था कि अनिरुद्ध की बिमारी के चुपचाप इलाज के नाम पर उसे नैनिताल ले जाएंगे ....वहाँ गुपचुप तरीके से एक चरित्र हीन लड़की से अनिरुद्ध की शादी करवा कर उसका गलत इलाज कराएंगे वो भी तब तक, जब तक अनिरुद्ध पूरी तरह से शारीरिक और मानसिक स्तर पर टूट नहीं जाए. और हुआ भी ऐसा ही. अनिरुद्ध की ज़िंदगी बरबाद कर उसे सड़क पर छोड़ दिया गया ......

अब अनिरुद्ध की वो हालत थी कि सड़क चलते लोग उसे नहीं पहचान पा रहे थे . अनिरुद्ध के आत्मविश्वास की धज्जियाँ उड़ गई थी. पर फिर भी वह नहीं समझ पा रहा था कि असल में उसकी बरबादी की वजह क्या है . वह हर पल अपनी बिमारी को ही अपनी बरबादी की वजह समझ कर भट्क रहा था. अपनों के ही विश्वासघात की कहानी अभी उसके सामने आई ही नहीं थी . वह समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ क्या हुआ और कैसे देखते - देखते वो चंद आवाज़ें व भ्रम ने उसकी शानदार ज़िंदगी को अर्श से फर्श पर ला दिया था. अनिरुद्ध नैनिताल की सड़कों पर पागलों की तरह घूमता फिर रहा था. उसकी हालत बेहद खराब थी. धीरे-धीरे भीख माँग कर किसी तरह उसने मुंबई वापस जाने की टिकट की व्यवस्था करी.

खैर , वह दिन भी आखिरकार आ ही गया जब अनिरुद्ध अर्धविक्षिप्त हालत में वापस मुंबई आ गया. मुंबई पहुँचते ही उसने अपने बंगले पर दस्तक दी . दरवाज़ा खुला. बंगला अब महल बन चुका था. पूरे घर की रंगत ही बदल गई थी. एक साल में सब कुछ बदल गया था. सिवाये एक पुराने नौकर के.......जिसने छोटे पर से अनिरुद्ध को देखा था. वो अनिरुद्ध को पहचान गया . अनिरुद्ध की वो हालत देख उस नौकर की आँखो से अश्रु की मानो नदियाँ बहने लगीं हो . अनिरुद्ध भी भाव विभोर हो गया ..... पर अनिरुद्ध को क्या पता था अभी तो ज़िंदगी का वो पन्ना खुलने की कगार पर है जहाँ अनिरुद्ध खुद को खुद से ही खो बैठेगा या यूँ कहें कि अनिरुद्ध के अस्तित्व का अंत उसका बेसब्री से उसका इंतजार कर रहा था . 

अनिरुद्ध के घर के अंदर कदम क्या पड़े ...उस पर तो मानो आसमां टूट पड़ा हो.....सब कुछ बदल गया था.......  सबसे सामने वाली दीवार पर आकाश की दर्जनों फोटो लगी थीं. फोटो देख कर ऐसा लग रहा था कि आकाश ने फिल्म इंड्स्ट्री में काफी नाम कमा लिया है. अनिरुद्ध ने दूसरी दीवार देखी . और उसे भीषण धक्का लगा...क्योंकि वहाँ जो फोटो लगी थी , उसकी तो अनिरुद्ध कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था .....वह फ़ोटो थी अनिरुद्ध के अपने बाप की उसकी नई पत्नी के साथ ... तरुण ने दूसरी शादी कर ली थी वो भी पल्लवी जो कभी अनिरुद्ध की पत्नी थी, उसके साथ . और तीसरी दीवार की ओर जब नज़र पड़ी तब तो अनिरुद्ध के पैरों के नीचे की जमीं ही खिसक गई .........अनिरुद्ध ने अपनी ही फोटो पर हार चढ़ा देखा...... अनिरुद्ध की आँखों के सामने अंधेरा छा गया.........उस वक़्त घर पर नौकर के अलावा कोई और नहीं था...किसी तरह उसने अनिरुद्ध को संभाला...... उसने अनिरुद्ध से कहा ,"बेटा ! तुम यहाँ से तुरंत भाग जाओ... अब ये जगह तुम्हारे लिये सही नहीं ...तुम्हारे पीठ पीछे यहाँ वो सारे काम होते हैं जो मुझे बताते हुए भी शर्म आती है...... तुम्हारी बरबादी के पीछे भी तुम्हारे अपनों का हाथ है.....बल्कि जिन्हें तुम इतने समय से अपना समझ रहे थे ...उनका तो दूर दूर तक तुमसे कोई संबंध ही नहीं है .....इनसे तुम्हारा खून का कोई रिश्ता नहीं......मुझे माफ कर दो बेटा कि मैंने इतने समय से ये बातें तुमसे छिपाई ...मैं डरता था ........कि अगर मैंने तुम्हें सच बताया तो तरुण मेरे बीवी बच्चों को खत्म कर देगा ...पर मुझे नहीं पता था कि इतिहास एक बार फिर दोहरा जाएगा..... मुझे पता था कि तुम मर नहीं सकते . तरुण ने तुम्हें मृ्त घोषित कर दिया है ....... और मुझे मेरे कर्मों की सजा भी मिल गई .......एक दुर्घटना में मेरी बीवी और बच्चे सबकी मौत हो गई ...ये मेरे ही कर्म थे ....मुझे तुम्हें सब  पहले ही बता देना चाहिये था. लेकिन मुझे नहीं पता था कि तरुण तुम्हारे साथ भी वही करेगा जो उसने तुम्हारे माँ- बाप के साथ किया था.... 27 साल पूर्व ..........."

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई.... नौकर घबरा गया .....   उसने पीछे के दरवाजे से अनिरुद्ध को भाग जाने को कहा.... और देर रात में उसके घर पर चुपचाप अनिरुद्ध को मिलने को कहा........

रात हो चुकी थी ...अनिरुद्ध समुद्र के किनारे एकांत में बैठा था ...भीड़ भी कम होती जा रही थी ...... तभी समुद्र की लहरों के साथ एक बड़ा सा बेहद खूबसूरत शंख अनिरुद्ध के पास आ गया .....अनिरुद्ध उसकी खूबसूरती हो देख इतना आकर्षित हुआ कि उसे अपने पास रख लिया ......कुछ देर बाद उसे कुछ दूर एक युवक दिखाई दिया ........20-22 वर्ष उम्र होगी उसकी.... अनिरुद्ध की तरफ उसकी पीठ थी ....... ऐसा लग रहा था कि वो युवक कुछ ढूँढ़ रहा था. अनिरुद्ध के सामने कुछ पुरानी यादें ताज़ा हो गईं.....अनिरुद्ध को याद आया वो पल जब ऐसे ही एक युवक से हुई मुलाकात ने अनिरुद्ध का जीवन ही बदल दिया था जो बेहद सकारात्मक बदलाव था.... आज भी अनिरुद्ध को ऐसे ही बदलाव की आवश्यकता थी. इस उम्मीद के साथ अनिरुद्ध उस युवक की ओर बढ़ा......... अनिरुद्ध ने युवक से पूछा कि. "क्या मैं आप की मदद कर सकता हूँ ?".......


युवक ने पलट कर देखा .......उसे देख अनिरुद्ध काँप उठा .........वो हूबहू वही युवक था जो करीब पाँच साल पूर्व अनिरुद्ध को मिला था.......पर ये कैसे मुमकिन था ..इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई बिलकुल न बदले.....ये तो चमत्कार ही था ...... अनिरुद्ध ने उससे कहा,"आप तो हीरा हैं ना"....... उस युवक ने कोई जवाब नहीं दिया ......वो अनिरुद्ध की ओर देख बड़े ही रहस्यमयी तरीकी से मुस्कुरा रहा था. अनिरुद्ध का शरीर काँपने लगा.... अचानक वही आवाज़ें पुन: सुनाई देने लगीं. अनिरुद्ध का सिर दर्द से फटा जा रहा था.... अनिरुद्ध इतना घबरा गया कि उसने उस युवक का हाथ पकड़ लिया. पर उस युवक का हाथ एकदम ठंडा था मानो कोई मृ्त शरीर को छू लिया हो ..... अनिरुद्ध द्वारा उस युवक को छूते ही युवक का शरीर सफेद पड़ता चला गया आँखो से आँसू बहने लगे .. और धीरे-धीरे वह एक धूमिल सी आकृ्ति बन गया .... अनिरुद्ध इससे पहले कुछ समझ पाता आवाज़ें इतनी तेज हो गईं कि अनिरुद्ध ने अपनी आँखे बंद कर ली ...जब वो आवाज़ें अनिरुद्ध के बर्दाशत से बाहर हो गईं तो उसकी चीख निकल पड़ी ....... अनिरुद्ध की उस एक चीख के बाद एक गहरा सन्नाटा छा गया ...बस लहरों की आवाज़ें ही सुनाई दे रही थी..... अनिरुद्ध चाह कर भी अपनी आँखें नहीं खोल पाया और वहीं लेट गया. ............... कुछ समय बाद जब अनिरुद्ध की आँखें खुली ....तो उसने अपने आप को तन्हा  पाया......एक गहरा सन्नाटा था उसके आस पास , समुद्र की लहरों के अलावा कोई अन्य आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थीं ..............अनिरुद्ध को अपनी तबियत पहले से बेहतर लग रही थी.......... वह सब कुछ भुला के अब एक नई शुरुआत करना चाहता था............. पर कहाँ जाए,  किससे मदद माँगे...ये सारे सवाल उसके सामने चुनौती बन कर खड़े हुए थे.....

फिर उसे अपने नौकर की बात याद आई ...कि उसने अनिरुद्ध को देर रात को उसके घर पर मिलने को कहा था.....उसे कुछ अनिरुद्ध को बताना था. अनिरुद्ध को जीवन की नई शुरुआत करने का यही सही रास्ता लगा ......उसे वो सब जानना था जिससे वो अभी तक अंजान था............ अनिरुद्ध ने उस शंख को उठाया जो लहरों के साथ उसके पास आ गया था.. और निकल पड़ा अपने 'मनहर काका' { नौकर } के पास .


'मनहर', मुंबई के एक चाल मे रहता था.... अनिरुद्ध ने दरवाज़े पर दस्तक दी . मनहर ने दरवाजा खोला.... और अनिरुद्ध को अपने गले से लगा लिया......
अनिरुद्ध ने अपने मनहर काका को तसल्ली दी ....मनहर ने खुद को संभालते हुए...... अधिक समय व्यर्थ न करते हुए अनिरुद्ध को उसके जीवन से जुड़ी सच्चाइयों से अवगत कराना प्रारंभ किया .

मनहर ने अनिरुद्ध को बताया कि अनिरुद्ध का असली बाप तरुण नहीं है....... तरुण तो वो आसतीन का साँप है जिसने अपने ही मालिक का बसा बसाया संसार उजाड़ कर रख दिया....
मनहर ने अनिरुद्ध को बताया ,"अंधेरी का जो आलीशान बंगला है ...वो असल में अनिरुद्ध के असली पिता का था.... अनिरुद्ध के पिता एक जाने माने गहनों व हीरों के व्यापारी थे.... और अनिरुद्ध की माँ सविता एक मशहूर अभिनेत्री थीं . जिनकी खूबसूरती की चर्चा हमेशा चरम पर रहती थी...... मनहर ने अनिरुद्ध के हाथों में शंख देख , भाव विभोर होते हुए बोला ,मेमसाब बिल्कुल आपकी तरह थी ..एकदम मासूम सी.......एकदम परी थीं वो ......गरीबों की मसीहा ......उन्हें भी शंखों का बहुत शौक था..... तब के जमाने में अपने परिवारिक विरोध के बावजूद उन्होंने अपने बल पर अपना नाम बनाया था. वे बहुत बहादुर थीं. फिल्म जगत में उनकी बहुत इज्ज़त थी........ तुम्हारे पिता उनके बहुत बड़े फैन थे ....... वो अक्सर तुम्हारी माँ की शूटिंग देखने जाया करते थे ......एक दिन अपने करीबी नौकर 'विनोद' द्वारा तुम्हारे पिता ने सविता मेमसाब को पत्र भिजवा के अपने प्रेम का इज़हार कर दिया......
उस वक़्त तो मेमसाब बहुत नाराज हुईं पर धीरे - धीरे इनका प्यार भी परवान चढ़ा और दोनों ने शादी कर ली. शादी के एक साल बाद तुम्हारा जन्म हुआ......तुम्हारे जन्म से तुम्हारे पिता और माँ बहूत प्रसन्न थे....बहुत सारे सपने देखे थे उन्होंने ...तब मैं भी उनके साथ था .....मैं उस शान का, उन खुशियों का अब एकमात्र गवाह हूँ ........ अभी तुम्हारे जन्म की खुशियाँ भी ठीक से नहीं मना पाए थे हम कि तुम्हारी माँ का चचेरा भाई 'तरुण' आ पहुँचा और सविता मेमसाब के सामने गिड़्गिड़ाने लगा कि उन पर रहम कर दो .........मेमेसाब उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना चाह्ती थीं क्योंकि वो अपने परिवार वालों की नीच हरकतों से भली-भाँति परिचित थीं....तरुण के साथ उसकी पत्नी भी थी  .....वो बार - बार गिड़गिड़ा रहा था...पैरों पर लोट रहा था... उसकी स्थिति काफी दयनीय थी.. ऐसे मैं तुम्हारे पिता को तरुण की हालत देख बड़ा दुख हुआ ....... और तुम्हारी माँ के लाख मना करने के बाद भी तुम्हारे पिता ने तरुण को अपने घर पर पनाह दी....तरुण ने कहा कि वो उनका अहसान जीवन भर नहीं भूल पाएगा .....जीवनपर्यंत उनका नौकर बन उनकी सेवा करेगा...... तुम्हारे पिता एक दयालु व्यक्ति थे .... और सविता मेमसाब उनसे बहुत प्रेम करती थीं ...तो मालिक की खुशी में ही उनकी खुशी भी थी...पर उन्हें क्या पता था कि दया कर के असल में वो आसतीन के साँपों को पनाह दे रहे हैं....जो एक दिन उनको ही डसेंगे .... और हुआ भी ऐसा ही .......तरुण ने धीरे - धीरे 1 साल के भीतर मालिक और मेमसाब की बसी बसाई गृ्हस्थी, सपने सब कुछ बरबाद कर दिये.....तुम्हारे पिता के करीबी नौकर विनोद ने तरुण पर मुकदमा करने की बात की  थी पर तरुण ने उसे भी रास्ते से हटा दिया.....सब कुछ तबाह हो गया था......तुम्हारे पिता की मौत की बात सुन , तुम्हारी माँ पागल हो गईं और कुछ दिन बात खबर मिली कि पागलखाने में छत से कूद कर उन्होंने आत्महत्या कर ली थी......सुनने में आता था कि अपने आखिरी समय में वो बस यही कहती रहती थीं कि, "भाग जाओ.....भाग जाओ."..............

तरुण ने अपने गुनाहों को  इतनी सफाई से अंजाम दिया जिसमे उसकी पत्नी ने भी उसका खूब साथ दिया....... कोई भी उनके खिलाफ कुछ नहीं कर पाया और जिसने आवाज़ उठाई भी , उसकी आवाज़ हमेशा के लिये बंद कर दी गई...... तरुण ने तुम्हारे पिता के व्यापार को बेच डाला और सारी संपत्ति अपने अधिकार में कर ली....... साम, दाम ,दंड , भेद का प्रयोग कर तरुण ने अपने रास्ते के हर काँटे को उखाड़ फेका..... सविता मेमसाब के भाई के नाम से फिल्म जगत में अपनी जगह बनाई ..चूँकि तुम्हारी माँ की बहुत इज्जत थी तो उनका भाई होने के नाते उसको भी काम मिलने लगा... और फिर गलत कामों द्वारा उसने तुम्हारे हक को तुमसे छीन उस पर अपना हक कायम कर लिया.....उसने फिल्म जगत में तुम्हारी माँ पर लाँछन भी लगाये और उन्हें भी बदनाम किया . मैं चाह कर भी कुछ ना कर सका ...... मुझे अपने बीवी , बच्चों की फिक्र थी.........पर देखो !! काश मैं आँखें बंद कर ये अत्याचार न देखता तो शायद इतनी ज़िंदगियाँ बरबाद न होतीं...............मुझे माफ कर दो बेटा..!   जब तरुण ने तुम्हारे मृ्त होने की घोषणा की , तब मैं पूरी तरह हिल गया था कि ये मुझसे कैसा पाप हो गया ......जिन मालिक और मेमसाब ने मेरे लिये एक वक़्त इतना कुछ किया उनकी अमानत को भी नहीं संभाल सका..... हर रोज ईश्वर से प्रार्थना करता था कि एक मौका मिल जाए तो अपने सारे पापों का  प्रायश्चित कर लूँ.......... और देखो ईश्वर ने मेरी सुन ली और तुम ज़िंदा हो ......ईश्वर को बहुत बहुत धन्यवाद..............."

अनिरुद्ध ये सब सुन सन्न रह गया था........उसकी आँखो के आँसू तो इतने बड़े विश्वासधात को सुन सूख ही गए थे.............. खोने को कुछ बाकी ना था.....अनिरुद्ध स्वयं बिल्कुल मुर्दा बन गया था.........पर वो टूटा न था...........

मनहर ने अनिरुद्ध को पानी दिया और कहा, "क्या तुम अपने असली माता- पिता की फोटो देखना चाहते हो" .......अनिरुद्ध कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था..... उसने मनहर को हाँ का इशारा किया ....मनहर ने एक बेहद पुराने संदूक को खोला ....उसमें से एक फोटो निकाली ...... फोटो जैसे ही अनिरुद्ध ने देखी उसके हाथ काँप गए .............. फोटो हाथ से छूट गई ...मनहर ने फोटो अपने हाथ में उठाई और कहा ये हैं तुम्हारी माँ , और ये हैं तुम्हारे पिता 'हीरा' जी.........और उनके बगल में 'विनोद' है......

अनिरुद्ध मनहर को देख कर रह गया ................. असल में अनिरुद्ध समझ ही नहीं पा रहा था कि ये आदमी कैसे उसके पिता हो सकते हैं तब जब उसने समुद्र किनारे उन्हें ही देखा है ...उनसे बात की है ...ये कैसे मुमकिन है .........और जिस आदमी को मनहर विनोद बता रहा है वो वही था जो उसे एक बार उसके फैन्स के बीच दिखा था ..जिसे देख  अनिरुद्ध भाग गया था और लोगों ने इसे अनिरुद्ध का भ्रम बताया था......अनिरुद्ध को भी "भाग जाओ, भाग जाओ" कहते हुए किसी की आवाज़ें सुनाई देती थीं .जैसा कि मनहर ने बताया कि अनिरुद्ध की माँ भी अपने आखिरी समय में बस यही कहती रहती थीं......

अनिरुद्ध ने अपनी तक्लीफों का जिक्र कभी मनहर से नहीं किया था...यहाँ तक की तरुण को भी उसने पूरी बात नहीं बताई ...तो जो उसने आज तक एहसास किया था , देखा था वो बातें उसकी पिछली ज़िंदगी का आईना थीं........मनहर की हर बात , मनहर द्वारा दिखाई हर तस्वीर उन लोगों के सच को सामने ला रही थी ... जिनकों अनिरुद्ध ने  पहले ही मह्सूस किया था और जिसे वो भ्रम मान रहा था .. असल में वही उसकी असली ज़िंदगी थी......

अनिरुद्ध समझ गया था कि उसे कोई मानसिक बिमारी नहीं ..... वो  Schizophrenia   का शिकार नहीं अपितु ये तो आभास था ......ये तो उसके अपनों का प्यार था , ये तो वो अप्रत्यक्ष शक्ति थी जो बार - बार उसे सचेत कर रही थी...कि कुछ बहुत गलत है ...... पर अनिरुद्ध ने अपने विश्वास पर विश्वास नहीं किया ......कभी जानने की कोशिश नहीं की वे कौन हैं जो उसे बार - बार दिखाई देते हैं........वे आवाज़े उससे क्या कहना चाहती हैं....... क्या संबंध है अनिरुद्ध का इन सब से ....


पर अब सब कुछ साफ था ...अनिरुद्ध अपना सब कुछ खो चुका था.....इतिहास एक बार फिर  दोहरा चुका था..जो 27 वर्ष पूर्व अनिरुद्ध के माता-पिता के साथ तरुण ने किया वही सब अनिरुद्ध के साथ भी तरुण द्वारा किया जा चुका था................
अनिरुद्ध को अपने पिता के साथ वो पहला अनुभव याद आया जब उन्होंने अनिरुद्ध से कहा था ...कि अगर गलती हो गई तो उसे सुधारा भी जा सकता है .....................अनिरुद्ध ने भी अपनी गलती को सुधारने और अपने माँ- बाप के बेहद दर्दनाक अंत का बदला लेने का फैसला किया ...........

उसने  तरुण के पापों का अंत करने का निर्णय लिया.......... उसने मनहर से कहा कि वो बस इतना कर दे कि किसी तरह अनिरुद्ध की  उसके बंगले में काम करने की व्यवस्था करवा  दे ...... मनहर ने आशंका जताई कि यदि अनिरुद्ध को किसी ने पहचान लिया तो ......
अनिरुद्ध ने मनहर को विश्वास दिलाया कि बचपन से आज तक तरुण ने उसे जब् कभी बेटा समझा ही नहीं तो उसको ध्यान से देखा क्या होगा.. और अब तो उसका यौवन , उसकी सुंदरता सव नष्ट हो चुकी है ....फिर भी अनिरुद्ध वहाँ गूँगा बन कर जाएगा और नौकर बन कर धीरे -धीरे आकाश को हथियार बनाकर तरुण को बरबाद कर डालेगा..........

अनिरुद्ध ने बड़ी ही सफाई से मनहर के पास उपलब्ध सीमित संसाधनों द्वारा अपना हुलिया पूर्णतया बदल डाला ... और वो दिन भी आ गया जब अनिरुद्ध नौकर के काम के लिये मनहर की मदद से तरुण के पास जा पहुँचा.....तरुण ने सबसे पहले तो अनिरुद्ध को देखते ही मना कर दिया कि उसे किसी नौकर की जरुरत नहीं .....हालाँकि अनिरुद्ध पर तरुण को जरा सा भी शक नहीं हुआ था....अनिरुद्ध ने इस बात का फायदा उठाया और झपट पड़ा तरुण के पैरों पर ...मनहर ने मौके की नज़ाकत समझते हुए तरूण से कहा ," साहब्! देखो बेचारा कैसे गिड़गिड़ा रहा है ..रख लो न इसे काम पे..विश्वास का आदमी है " ......तरुण ने आखिरकार मनहर की बात मान ली और अंजाने में अनिरुद्ध को नौकर बना लिया...........

इतिहास पुन: खुद को दोहराने वाला था...........अनिरुद्ध ने धीरे- धीरे तरुण और आकाश के गलत कामों के खिलाफ सबूत इकट्ठे करने शुरु किये.... इतने सालों से तरुण के काले कारनामों का विरोध करने की किसी की औकात नहीं थी.....इसलिये तरुण खंडेलवाल बेफिक्री से खुलेआम ड्रग्स , लड़्कियों की दलाली जैसे घिनौनें कामों को अपने घर पर ही अंजाम देता था ..जिसमें आकाश और पल्लवी भी शामिल थे ...इसके लिये घर में ही एक अलग कमरे का इंतेजाम था........अनिरुद्ध चूंकि एक पढ़ा-लिखा युवक था... उसे सबूत इकट्ठा करने के लिये ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी .....एक दिन उचित मौका देख अनिरुद्ध ने आकाश और तरुण के लैपटॉप से उनका सारा डेटा एक पेनड्राइव में सेव कर  लिया ....चूकिं आकाश , तरुण और पल्लवी  अश्लील फिल्म के गंदे काम में लिप्त थे ..इसी वजह से सबूत मिलने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई.....फिर क्या था उचित मौका देख अनिरुद्ध ने दुनिया भर की मीडिया को बुला लिया ....... मीडिया ने तरुण , आकाश और पल्लवी को काले कारनामों में लिप्त रंगे हाथों पकड़ लिया............. और तब अनिरुद्ध ने देश के तमाम न्यूज़ चेनल्स के सामने अपना नकली हुलिया उतार फेका...... और लोगो को अपना परिचय दिया.....

मीडिया वालों के पूछने पर कि आपके बाप  ने तो आपको मृ्त घोषित किया था......आप  तो पागल हो गये थे....ऐसे तमाम सवालों के जवाब में अनिरुद्ध ने कहा," जी नहीं! मैं पागल नहीं हूँ ...बल्कि मेरे अपने बाप तरुण खंडेलवाल ने मेरा इस्तेमाल किया ...ये पहले से ही इन काले कामों में लिप्त थे.... और जब मुझे  इसके बारे में पता चला तो मैंने इनका विरोध किया ...बदले में इन्होंने , आकाश और पल्लवी ने मुझे मार डालने की कोशिशें की, मेरा अपहरण किया और देखिये मेरी क्या  हालत कर डाली ....इतने समय से मैं इनकी कैद में था नैनिताल में ...किसी तरह बचते छिपाते यहाँ आया ...तो पता चला कि  इन्होंने मुझे मृ्त घोषित कर दिया था............ असल में  मैंने इनका विरोध किया जिसकी सजा इन्होंने मुझे दी ...पर गलत काम गलत है और हर गलत काम करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिये फिर चाहे वो मेरा बाप , भाई ही क्यों ना हों "..... अनिरुद्ध के ये कहते ही हर कोई तालियों से अनिरुद्ध का हौसला बढ़ाने लगे  ..... कुछ मीडिया वालों ने कहा कि ,"ये हैं असली हीरो"......अखिरकार जनता को  उनका हीरो दोबारा मिल गया........अनिरुद्ध ने सब कुछ खोने के बाद भी एक झटके में खुद के विश्वास के दम पर वो सब वापस पा लिया जो उसका अपना था..... और तरुण, आकाश व  पल्लवी को समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे अचानक देखते-ही-देखते एक बार फिर उनकी ज़िंदगी आ गई अर्श से फर्श पर................




                              - स्वप्निल शुक्ल


               ( Posted By - Rishabh Shuka )







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Monday, 10 September 2012

प्रेम बनाम सेक्स


 प्रेम बनाम सेक्स

प्रेम एक बेहद आनंददायक अनुभूति है, सुखद अहसास है परंतु आज के परिवेश में अधिकांश लोग इसको सेक्स का पर्याय मान रहे हैं . आज के आधुनिक समाज में इसका अंतरंग प्रदर्शन आम है . समय के साथ लोगों की सोच में  तेजी से इज़ाफा हो रहा है. आज की मार्डन युवा पीढ़ी अपने प्रेम का खुल के इज़हार करने में यकीन  करती है  ... और प्रेम का इज़हार करने का तरीका सेक्स को मानते हैं ...इसलिये आज लिव - इन -रिलेशनशिप , शादी से पहले बच्चे , सेक्स स्कैंडल जैसी तमाम बातें आम होती जा रही हैं
हमारे आधुनिक समाज में जो संस्कृ्ति पल बढ़ रही है , उसमें मूव - आन { Move On } प्रवृ्त्ति देखी जाती है. किसी भी चीज़ का रसास्वादन करो , आगे बढ़ो और भूल जाओ. लोगों की खासकर युवा पीढ़ी की सोच के स्तर में भी बहुत बदलाव आया है. सूक्ष्म स्तर पर प्रेम जैसी कोमल भावना को आज की युवा पीढ़ी महसूस नहीं कर पाती .
आज के आधुनिक समाज के युवाओं में बढ़ता पोर्न का क्रेज़, सेक्स की तीव्र इच्छा ने कहीं न कहीं प्रेम जैसे खूबसूरत शब्द को भी विसंगतियों से भर दिया है .
नि:संदेह अंतरंग संबंध  दो प्यार करने वालों के रिश्ते को प्रगाढ़ता प्रदान करता करता है परंतु सेक्स की भावना की अत्यधिक प्रचुरता ????? अपने जीवनसाथी से हर पल हर वक़्त सेक्स में लिप्त रहने की अपेक्षा व इच्छा , हमारे आधुनिक समाज की युवा पीढ़ी की कौन सी मनोदशा दर्शाता है??
यदि साहित्य जगत की ही बात करें तो कामोत्तेजक लेखन हर वर्ग के पाठकों को अपनी ओर खींचने में सक्षम है.  यदि फिल्म जगत की बात करें तो यहाँ भी दर्शकों को थियेटर तक लाने में रोमांस और सेक्स का तड़का बेहद कारगर सिद्ध होता है .

प्रेम और सेक्स दोनों अलग शब्द हैं ...दोनों का अर्थ भी भिन्न हैं..... प्रेम को सेक्स का पर्यायवाची कहना या समझना नि:संदेह गलत है. क्योंकि सेक्स मात्र अपने जीवनसाथी को प्रेम दर्शाने का एक हिस्सा है न कि सिर्फ एक मात्र ज़रिया.

आज युवा पीढ़ी अपने पार्टनर से सेक्स में हर दम हर पल कुछ नया चाहते हैं तभी सेक्स की भी दो ब्रांचेस कर दी गईं हैं जो बेहद हास्यास्पद है ...सॉफ्ट सेक्स व हार्ड सेक्स ...यह हमारे आधुनिक समाज की ही देन है.
जमाना बढ़ा और हमारा आधुनिक समाज आज सुपर आधुनिक समाज की दहलीज़ पार करने को भी आतुर है तभी तो आज की युवा पीढ़ी अपने जोड़ीदार से सेक्स में क्या चाहते हैं, एक दूसरे से क्या अपेक्षा रखते हैं ..इस पर खुल के चर्चा होती है... इस खुलेपन के फलस्वरूप सेक्स में  वेरियेशन्स ने जगह बना ली है.  जहाँ हमारे भारतीय समाज में कामसूत्र को ही सेक्स की  कुँजी माना जाता था, अब उसकी जगह पोर्न वेबसाइट्स ने ले ली है.

वाइल्ड  सेक्स, वॉटर सेक्स् , रोस सेक्स्, चॉकलेट सेक्स् , मड सेक्स्, गाड़ी के भीतर सेक्स्, झाड़ियों के पीछे सेक्स्, खुले में सेक्स्, खंबे की पीछे सेक्स् आदि सेक्स् के कुछ "वेरियेशन्स" हैं .

प्रश्न यह उठता है कि सेक्स् में इतने खुलेपन व इसका अनपेक्षित विस्तार हमारी युवा पीढ़ी , हमारे समाज को किस ओर ले जा रहा है ?

ध्यान रहे सेक्स् कहीं प्रेम जैसी खूबसूरत भावना व अनुभूति पर इतना हावी न हो जाए कि प्रेम का पर्याय ही पूर्णतया बदल जाए. क्योंकि प्रेम एक ऐसी भावना है ...एक ऐसा खूबसूरत अहसास है जो आपके हृ्दय के तार आपके जीवन साथी से जोड़ देता है ...आप अपने जीवन साथी पर निस्वार्थ भाव से सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं...संपूर्ण समर्पण की ये भावना अंतरंगता के सभी दायरों को तोड़ शारीरिक व मानसिक संबंध से जुड़ एक नए जीवन का निर्माण व उत्पन्न करने की शक्ति प्रदान करता है .... यही है प्रेम की शक्ति और सच्चे प्रेम का पर्याय.

आपके विचारों, टिप्पणियों, सलाहों  के इंतजार के साथ , आपका :

                                                      - ऋषभ शुक्ल






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Tuesday, 4 September 2012

मेरी मौत



मेरी मौत ( 1989- 20_ _)

स ज़िंदगी ने हमें बहुत से रंग दिखाये,
बहुत से चेहरे दिखाये,
बहुत से चेहरों पर से नकाब हटाये,
बहुत से राज़ बताये,
हर वक़्त से रुबरु कराया,
इस ज़िंदगी ने हमें .

क्या करें अपनी ज़िंदगी की बात ,
जिसकी शुरुआत में ही था घना कोहरा व अंधेरी रात,
बचपन था हमारा एक काला साहिल ,
जिसका कोई अंत न था.
बना दिया था हमारे ही अपनों ने ,
ज़िंदगी को हमारी एक मज़ाक,
अपनों से मिले ज़ख्मों का जाम पी-पी के,
घुटन भरा बचपन कब जवानी की दहलीज़
पर आ खड़ा हुआ, इसका हमें
कभी एहसास ही न हुआ.
पर हमने न छोड़ा उम्मीद का दामन,
उम्मीद थी हमें ज़िंदगी तो अपनी जिएंगे शान से,
और मौत को भी तब तक करना होगा इंतज़ार ,
खड़े होकर कतार में.

आज जो पाया है, जो खोया है ,
जो हासिल किया,
जो लिया है , जो दिया है , इस ज़िंदगी को ,
उन सब पर फक्र है हमें.
खुश हैं हम अपनी इस ज़िंदगी से ,
नहीं कोई गम बाकी इस ज़िंदगी में .
अब तो लगता है कि मौत भी देगी,
सुकून व चैन की हर साँस हमें,
चूंकि अब तो कोई रंग न बाकी रहा,
जिसे हमने न जिया हो इस ज़िंदगानी में .

वो वक़्त अब आ गया जिसका हमें इंतज़ार था ,
बड़ी बेकरारी से,
वो सब हमने पा लिया , जिसका हमें करार था ,
अपनी इस ज़िंदगानी से .
नहीं पाई तो बस एक चीज़ जो  है, मेरी मौत.
अब बस कुछ पाना है तो वो है मौत.
अब बस कुछ गले लगाना है तो वो है मौत.

ऎ मेरी मौत ! देख तेरा एक तन्हा आशिक बुला रहा है तुझे .
अब तो तन्हा न छोड़ मुझे,
भर ले आगोश में अपने
ऎ मेरी मौत ! आ गले लगा ले मुझे,
महरुम हूँ तो बस तेरे इश्क़ से.
अब बस आ मुझे थाम ले ,
थाम लेने दे दामन अपना मुझे , ऎ मेरी मौत
ज़िंदगी का सफर यहीं तक ,
मौत के सफर का आरंभ...................

                                                      - ऋषभ शुक्ल


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